इक दिन दिल ऊब जाएगा शे'र-ओ-शाइ'री से
अनबन अजीब सी हो जाएगी ज़िंदगी से
अनबन अजीब सी हो जाएगी ज़िंदगी से
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छुपा मैं सब से रखूँगा लगा के सीने से
मुझे जो कुछ भी मिलेगा ख़ुदा मदीने से
मुझे जो कुछ भी मिलेगा ख़ुदा मदीने से
तू रब तू सब तू ही मुर्शिद तू रहनुमा मेरा
मैं गिर गया हूँ भँवर में तेरे सफ़ीने से
उठा हूँ गिर के भी मैं बार बार हर दम यार
चमक रही है ये क़िस्मत मेरी पसीने से
मैं चढ़ रहा हूँ अभी तक नई नई सीढ़ी
मुझे दिखा था कभी चाँद मेरे ज़ीने से
चुरा के नींद दिखाता है ख़्वाब दिन में भी
हसीन यार चुराले जो दिल भी सीने से
मुझे थी ख़ूब पिलाई शराब यारों ने
मगर हुआ ही नहीं कम ये दर्द पीने से
मिटे नहीं हैं न मिट सकते हैं कभी दिल से
न ज़ख़्म होते कभी ठीक सिर्फ़ सीने से
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प्यार से है नफ़रत तो अब सुकून है दिल को
थी नहीं हमारी है अब तलाश मंज़िल को
थी नहीं हमारी है अब तलाश मंज़िल को
दिल निकाल सीने से सौंप देना मालिक को
मेरी आख़िरी इच्छा तुम बता दो क़ातिल को
मेरे दिल का इक कोना उस में है अँधेरा बस
सब का दिल लगे मुझ से सब से डर लगे दिल को
तू नहीं ये समझेगी घर का मैं बड़ा लड़का
छोड़ मेरी बातों को क्यूँ बढ़ाना मुश्किल को
घाट घाट पानी पी हम तो अब भी प्यासे हैं
ख़ुद थे भटके हम साहिब पथ दिखाया मंज़िल को
थोड़ा नीचे गर्दन से शर्ट में छुपा उस की
बुझ गई थीं दो आँखें इतना देखा इक तिल को
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थे रुके नभ में बादल भी जाते हुए
देख बारिश में उस को नहाते हुए
देख बारिश में उस को नहाते हुए
कितनी है ख़ूब-सूरत बताऊँ तुम्हें
फूल भी छेड़ते आते जाते हुए
रात देखे उसे प्यार से रात भर
सो गई सुब्ह उस को जगाते हुए
बात घंटों किसी शाम हो प्यार की
पैर आधे नदी में डुबाते हुए
चाँद जैसा बदन फूल जैसा है दिल
ऐ ख़ुदा क्या था सोचा बनाते हुए
एक धुन थी सुब्ह उस के होंटों पे रब
दिन मिरा गुज़रा वो गुनगुनाते हुए
और प्यारी मुझे लग रही है सनम
जब से देखा उसे आम खाते हुए
दिल भी पत्थर हुआ हम भी पत्थर हुए
आख़िरी बार सीने लगाते हुए
ज़ख़्म तो हैं क़ुरेदे उसी शे'र ने
रो पड़ा जिस को शाइ'र सुनाते हुए
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कितना गोरा रंग है उस का कितना काला दिल उस का
लड़ते हैं सब आपस में जिस जिस ने देखा तिल उस का
लड़ते हैं सब आपस में जिस जिस ने देखा तिल उस का
और किसी से होती थीं जी भर कर रातों बातें और
इक हम ही पागल थे जो भरते थे फोन का बिल उस का
ये भी सच है मुझ को गाँव से घर से निकलवाने में बस
मेरा दिल तो था ही और दिमाग़ भी था शामिल उस का
कितने ही दिल टूटे थे कितने ही जान गँवा बैठे
रश्क से मर जाते है हम तो इश्क़ भी है क़ातिल उस का
हम तो पागल हैं साहिब जो उस के इश्क़ में पागल हैं
समझाया था रक़ीब को बाक़ी तो मुस्तक़बिल उस का
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बड़े घर में अब है बियाही गई वो
मिरी छोटे से दिल में आई नहीं जो
मिरी छोटे से दिल में आई नहीं जो
वो सजती सँवरती न बनती जो दुल्हन
तो क्या और करती मेरी जाँ बताओ
अज़िय्यत मिली आशनाई में अब तक
वो कह के गई अब रिहाई मुझे दो
मुझे देख मंडप में रोने लगी थी
मैं पागल उसे बे-वफ़ा कह रहा जो
सुना मैं ने है रूह मरती नहीं है
चिता आशिक़ों की सही से जलाओ
ख़ुशी भी नहीं होती ग़म भी नहीं अब
मुझे अब किसी डॉक्टर को दिखाओ
लगे चुभने अब ख़्वाब आँखों में हमदम
मेरी रात होने से पहले न जाओ
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सुनो बातें बच्चों को कुछ गाँव की भी बताया करो
ज़मीं पर कभी बैठ बच्चों को खाना खिलाया करो
ज़मीं पर कभी बैठ बच्चों को खाना खिलाया करो
नहीं सिर्फ़ माँ बाप दुनिया में सब कुछ समझ लो ये तुम
कभी उन को मामा के चाचा के घर ले के जाया करो
अगर उम्र हो दस से कम डाँट भी सकते हो तुम उसे
बड़ा हो अगर उस से तो प्यार से तुम सिखाया करो
ये तुम जान लो वक़्त दुनिया में सब से अधिक क़ीमती
उन्हें वक़्त दो यार कम ये खिलौने दिलाया करो
अगर चाहते हो कि बेटा करे सबकी इज़्ज़त यहाँ
तो फिर उस की माँ पर मोहब्बत लुटाया करो
ज़रा है ये मुश्किल तो पूरी तरह दूर रखना मगर
करो कुछ भी बच्चों को अब फ़ोन से तुम बचाया करो
उसे अपने पैरों पे चलना है गिर गिर के उठना है अब
उसे जीने दो थोड़ा सीने से तुम कम लगाया करो
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जब इबादत की नहीं तुम ने मोहब्बत की नहीं
क्या मिलेगा जा के जन्नत ज़िन्दगी जो जी नहीं
क्या मिलेगा जा के जन्नत ज़िन्दगी जो जी नहीं
हर ख़ुशी हर ग़म में सहरा से समुंदर में सदा
था ख़ुदा बस है ख़ुदा बस उस के बिन कुछ भी नहीं
तू मिला तो सब मिला सब में मिला बस तू ही तू
तू ही तन मन तू ही सब कुछ तेरे बिन कुछ भी नहीं
ये कहा तुम ने कहीं जा मर तो लो मैं मर गया
इश्क़ में मारा गया मैं ख़ुद-कुशी तो की नहीं
इश्क़ को होता गया यूँ इश्क़ हम से ऐ ख़ुदा
खो गया था मैं भी ख़ुद में तू भी तुझ में थी नहीं
प्यार माँगा प्यार चाहा प्यार जाने है कहाँ
प्यार में था मैं मरा शर्मिंदगी कोई नहीं
इक नज़र भर देख लूँ मैं फिर जो चाहे हो सो हो
टूटना दिल का यहाँ वैसे भी बर्बादी नहीं
बात की फूलों से उस ने यूँ गया गुलशन महक
शुक्र है उस ने ख़ुदा कोई कली चूमी नहीं
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तिरी चौखट पे रख कर सर
मैं सर पर मार लूँ पत्थर
मैं सर पर मार लूँ पत्थर
मोहब्बत की क़सम तोड़ी
मरूँ अब मैं कहाँ जा कर
डराओगे जो इतना तुम
निकल जाएगा सारा डर
मैं जो निकला तिरे दिल से
नहीं देखा है अपना घर
ये आँखें लाल कपड़े चाक
मैं कैसे जाऊँ अब दफ़्तर
मेरी मेहनत का था जो फल
गया ले कर कोई अफ़सर
कभी था क़ाफ़िला पीछे
हुआ हूँ आज बिन लश्कर
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मोहब्बत में कहा हम ने है ऐसा भी
ज़रा सा चाहिए लैला को पैसा भी
ज़रा सा चाहिए लैला को पैसा भी
है ऊपर से ख़ुदा सब देखता हर पल
सही में चाहिए जैसे को तैसा भी
वो मजनूँ हो के राँझा हीर या शीरीं
हो सकता है हमारा हाल वैसा भी
ख़ुदा ने भी बनाया क्या कहाँ कैसा
वहाँ ग़ालिब यहाँ नाचीज़ जैसा भी
समझ वाले भी रोते हैं यहाँ आ कर
नहीं चलता यहाँ पर इश्क़ कैसा भी
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