वहीं से हार कर लौटा मुसाफ़िर
    जहाँ से जीत कर जाना भला था
    Dinesh Sen Shubh
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    कोई आवाज़ देता है कहीं से
    मगर दिखता नहीं है कौन है वो
    Dinesh Sen Shubh
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    मैं अमानत हुआ था कितनों की
    बाद में कह दिया पिया तुमने
    Dinesh Sen Shubh
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    राधिका से भी कृष्ण बिछड़े थे
    तुम को लगता है तुम अकेले हो
    Dinesh Sen Shubh
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    हो गहरी बात तो गहराई से समझा करो यारो
    कोई शा'इर कभी अश'आर बेमतलब नहीं लिखता
    Dinesh Sen Shubh
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    आज भी है याद वो नंबर पुराना यार का
    बात वो है और उसमें फ़ोन अब लगता नहीं
    Dinesh Sen Shubh
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    जिस्म से रूह ज्यों निकलती है
    बेटियाँ माँ के घर से जाती हैं
    Dinesh Sen Shubh
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    किसी जर्जर 'इमारत को सहारा कौन देता है
    रहो नाकाम तो अवसर दुबारा कौन देता है

    यहाँ किसको पड़ी है कौन जीता कौन मरता है
    यहाँ ता- 'उम्र बेबस को गुज़ारा कौन देता है

    किसी से जब मिलो तो फ़ासला कुछ दूर का रखना
    नदी डूबे समुंदर में किनारा कौन देता है

    यहाँ उपहार भी पाने की ख़ातिर हैं दिये जाते
    भला मुफ़लिस को खाने को छुहारा कौन देता है

    अदब इंसान की 'आदत में शामिल हो ही जाती है
    हुए रुख़्सत को रुकने का इशारा कौन देता है

    यहाँ सब लोग मिट्टी से बने हैं जानते हैं सब
    मगर मिट्टी को उसका मोल सारा कौन देता है

    फ़क़त आसान है आँखों में "शुभ" सपने सजाना भी
    मगर हर एक को टूटा सितारा कौन देता है
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    Dinesh Sen Shubh
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    हमें तो उस के काँधों का सहारा बस सहारा है
    पिता है वो हमारा इस जहाँ में सब से प्यारा है
    Dinesh Sen Shubh
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    इश्क़ मोहब्बत तन्हा रातें छोड़ो ना
    उनकी बातें उनकी बातें छोड़ो ना
    Dinesh Sen Shubh
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