कुछ दिन तो वो साथ रहेगा हर लम्हा
उस के बा'द तो फ़ुर्क़त फ़ुर्क़त होती है
हिज्र-ए-जानाँ में तुम ऐसे तड़पोगे
बिन पानी मछली सी हालत होती है
चंद घड़ी में ऐसे वो बदले है रंग
गिरगिट को भी उस पे हैरत होती है
तुम को ले कर लाखों ख़्वाब सजाए थे
अपने उस ख़्वाबों पे नदामत होती है
लोहा जैसे खा जाता इंसानों को
जंग के जैसी ही ये मोहब्बत होती है
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बात सुन लो मेरी सुधर जाओ
इश्क़ अच्छा नहीं है घर जाओ
इश्क़ अच्छा नहीं है घर जाओ
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मैं जो हूँ एक अजब दरिंदा हूँ
मैं ने ख़्वाहिश को अपनी खाई है
मैं ने ख़्वाहिश को अपनी खाई है
इश्क़ की आख़िरी हदों पर हूँ
आख़िरी हद जो बे-वफ़ाई है
Read Fullआख़िरी हद जो बे-वफ़ाई है
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जौन को रोज़ पढ़ रहा है वो
या'नी हर ग़म में आश्ना है वो
या'नी हर ग़म में आश्ना है वो
है वो जिस के ख़याल में गुम-सुम
कोई लड़की नहीं बला है वो
तू समझता है उस को नाज़ुक सा
माँओं के लाल खा गया है वो
बे-झिझक मिल रहा है वो मुझ से
दर्ज-ए-अव्वल का बे-वफ़ा है वो
सुर्ख़ रंगों से ऐसी क्या रग़बत
हर पलक ख़ून थूकता है वो
तुम करोगे बराबरी उस की
वो जो है जौन एलिया है वो
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