दिल जी अब एक सराए हैं
सब ग़म इस में रुकवाए हैं
सब ग़म इस में रुकवाए हैं
ये सब आपस में लड़ते हैं
दिन चीख़ें शब चिल्लाए हैं
हर रोज़ तमाशा होता है
ये सब के सब पगलाए हैं
मैं बोलूँ रह लो मिल जुल के
क्यूँ यूँ ही बात बढ़ाए हैं
कुछ और नहीं ये करते बस
दिल मेरा ये तड़पाए हैं
मैं अक्सर इनसे पूछूँ हूँ
ये किस ख़ातिर याँ आए हैं
न लड़े अब से ये सारे, सो
हम इक तरकीब लगाए हैं
दुख कम हो जाता बाँटों तो
दिल के टुकड़े कर वाए हैं
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कुंडी लगा के रात से बैठा है कमरे में
रस्सी है वो है पटरा है पंखा है कमरे में
रस्सी है वो है पटरा है पंखा है कमरे में
ठहरो ज़रा रुको तो मेरी बात तो सुनो
ओ जाने वाले देख तो क्या क्या है कमरे में
कुछ पेन डाइरी हैं किताबो के ढेर हैं
इन सब के बावजूद भी तन्हा है कमरे में
दीवार खिड़की कुर्सी व टेबल रहे हैं पूछ
क्या हम को छोड़ जाना यूँ अच्छा है कमरे में
हालात से है जंग नहीं छोड़ बीच में
सो जा चला के पंखे को गद्दा है कमरे में
सरवत तुझे क़सम है तू पटरी से दूर रह
खिड़की से तुझ को देखता बच्चा है कमरे में
दुनिया जला के दिल की बढ़े हर दिशा में ये
सीने में जलता रेल का डिब्बा है कमरे में
जाओ तमाश-बीन कुछ और अब करो चलो
हर दिन हमारे याँ यही होता है कमरे में
पर्दा लगा के खिड़की पे करते हैं जाने क्या
अनमैरिड इक कपल यहाँ रहता है कमरे में
क्या क्या कुनाल सोच तू बैठा अभी से है
सोचा हुआ भला कभी होता है कमरे में
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अभी खाते हो क़स
में साथ जीने साथ मरने की
रुको उतरेगा सर से ये ख़ुमार आहिस्ता आहिस्ता
हुए पहले पहल तो मनमुटाव आहिस्ता आहिस्ता
सजनवा फिर हुए बैरी हमार आहिस्ता आहिस्ता
गली की एक खिड़की जब खुले तब जाम लगता है
निकलते फिर सभी पैदल, सवार आहिस्ता आहिस्ता
लगेगा वक़्त थोड़ा और लेकिन काम ज़ारी है
सभी आएँगे मुझ में पर सुधार आहिस्ता आहिस्ता
बदन खुलने में आख़िर देर अब कितनी ही लगती है
खुला करते मगर दिल के द्वार आहिस्ता आहिस्ता
चली है बनके दुल्हन जान मेरी आज डोली में
ज़रा डोली उठाना ओ कहार आहिस्ता आहिस्ता
अभी रुतबा बराबर है अभी हम दोनो पत्थर हैं
बनाएगें उसे परवर दिगार आहिस्ता आहिस्ता
मुझे ऐ ज़िंदगी किश्तों में बांटी थी ख़ुशी तू ने
उतारूँगा तेरा मैं भी उधार आहिस्ता आहिस्ता
सुना था ढ़ाई अक्षर प्रेम के पढ़ ले वो पंडित है
चलो पंडित बने हम सब गँवार आहिस्ता आहिस्ता
अभी बस बहर में लफ़्ज़ों को बैठा कर मैं देखूँ हूँ
मेरी ग़ज़लो में आएगा निखार आहिस्ता आहिस्ता
कहीं जाते नहीं पर उम्र भर रहते सफ़र में जो
उन्हीं में हो गए हम भी शुमार आहिस्ता आहिस्ता
बनाया दिल को मैं ने जेल कर के क़ैद सब रक्खी
मगर होती गईं ख़ुशियाँ फ़रार आहिस्ता आहिस्ता
न जाने प्रेम कितने पनपे कितने मर गए दिल में
मेरा ये दिल बना दिल से मज़ार आहिस्ता आहिस्ता
अचानक यूँ तेरा इनकार मेरी जान ले लेगा
मुहब्बत को मेरी जानम नकार आहिस्ता आहिस्ता
लगे है धीरे धीरे जी मुहब्बत में बड़े शा'इर
भले कामों में मिलती है पगार आहिस्ता आहिस्ता
कुनाल अब तो तुम अपनी हरकतों से बाज़ आजाओ
अमाँ आएँगे जल्दी क्या है यार आहिस्ता आहिस्ता
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मरने पे सबके रोता है कैसा है आदमी
सचमुच में ज़िंदा कब यहाँ होता है आदमी
सचमुच में ज़िंदा कब यहाँ होता है आदमी
सब से हसीं फ़रेब है दुनिया में औरतें
सब से बुरा ज़माने में धोखा है आदमी
सूरज को देखता हूँ तो लगता है यूँ मुझे
सीने में आसमान के जलता है आदमी
सिगरेट, शराब और सभी जानलेवा ऐब
मरता नहीं, इन्ही से तो जीता है आदमी
उस को बिछड़ते वक़्त नहीं अलविदा कहा
मरने के बा'द भी कभी बोला है आदमी
इतराए वो बनाके वहाँ एक आदमी
लाखों ख़ुदा बनाके याँ बैठा है आदमी
शैतान,जानवर,कभी काफ़िर कभी ख़ुदा
एक आदमी को छोड़ के क्या क्या है आदमी
भगवान तो चलो कभी आजाए सपने में
पर सच बताओ क्या कभी देखा है आदमी
बनता है ख़ून, मांस व हड्डी को जोड़ कर
मिट्टी से यार कब भला बनता है आदमी
मेरा बनाया वो ख़ुदा महलों में रहता है
उस का बनाया सड़कों पे रहता है आदमी
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तुम अक्सर याद आते हो भुलाने के बहाने से
कहाँ फिर दिल सँभलता लाख समझाने बुझाने से
कहाँ फिर दिल सँभलता लाख समझाने बुझाने से
करूँ कोशिश बहुत मैं इस को बहला लूँ या फुसला लूँ
मगर बच्चा नहीं दिल मान जाए जो मनाने से
पुराना ढूँडने को कुछ, ज़मीन–ए–दिल गई खोदी
तेरी यादें निकल आईं दबे दिल के ख़ज़ाने से
पलट कर नींद में भी तेरा मुझ से वो लिपट जाना
कभी जब हाथ सरकाया तेरे मैं ने सिरहाने से
तुम आए क़ब्र पे तब जाके सोया चैन से हूँ मैं
भटकती रूह फिरती थी मेरी याँ इक ज़माने से
था इक वो दौर दो दीवाने पगले पगले फिरते थे
है इक ये दौर दो पागल फिरें हैं अब दिवाने से
नहीं हो ख़त्म तेरा दुख किसी शय से किसी मय से
भरे हैं ज़ख़्म मरहम से नहीं पट्टी लगाने से
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मैं प्यार तो करता हूँ, मैं दिलदार नहीं हूँ
मैं वार तो करता हूँ , मैं तलवार नहीं हूँ
मैं वार तो करता हूँ , मैं तलवार नहीं हूँ
माना कि मैं दुनिया तेरे कुछ काम न आया
ख़ुदरंग हो सकता हूँ, मैं बेकार नहीं हूँ
मैं जाँच परख कर के तुझे अपना बना लूँ
आशिक़ हूँ तेरा, तेरा ख़रीदार नहीं हूँ
कह कुछ दूँ, करूँ कुछ, मैं पलट बात से जाऊँ
मैं, मैं हूँ मेरी जान, मेरा यार नहीं हूँ
तू ने जो दिया छोड़ न टकराया किसी से
अंधा हूँ बिना लकड़ी पर इस बार नहीं हूँ
जीवन को भरोसे पे मेरे काटने वाले
रस्ते का मुसाफ़िर हूँ मैं हमवार नहीं हूँ
तू था नहीं तो लगता था बस तेरी कमी है
क्यूँ अब तेरे होने पे मैं साकार नहीं हूँ
पैसे मिले तो सच को मैं अब झूठ बना दूँ
शाइ'र की क़लम हूँ मैं, मैं अख़बार नहीं हूँ
ये हुस्न के नुस्ख़े न चले मुझ पे पता क्यूँ
मैं वैद्य हूँ मैं इश्क़ का बीमार नहीं हूँ
उँगली पे नचाने को मचलता है मुझे क्यूँ
जो तू ने लिखा था मैं वो किरदार नहीं हूँ
मौला मेरे मौला मेरी फ़रियाद ज़रा सुन
क्या उस की मुहब्बत का मैं हक़दार नहीं हूँ
ये ज़िंदगी की कश्ती जिधर जाए सो जाए
माँझी नहीं मैं, इस की मैं पतवार नहीं हूँ
मैं साथ तो चलता हूँ सदा सब के बराबर
इस पार तो होता हूँ मैं उस पार नहीं हूँ
मैं दिल हूँ मुझे तोड़ने वालों ज़रा सुन लो
मैं एक ही हूँ सीने में दो चार नहीं हूँ
मिलने की तमन्ना हो चले आया करो बस
दिन देख के आते हो मैं त्यौहार नहीं हूँ
बहरूपिया हूँ अस्ल में, मैं नीम नहीं हूँ
कड़वा तो बहुत हूँ मैं, असरदार नहीं हूँ
हफ़्ते की ये दूरी सही जाए नहीं मुझ से
बुधवार समझ मिल मुझे इतवार नहीं हूँ
छोड़ा था तुझे पर न हुआ ग़ैर का हम दम
तन्हा भले, साथी का तलबगार नहीं हूँ
रफ़्तार मेरी अपनी मेरा अपना सफ़र है
बढ़ तो रहा हूँ आगे लगातार नहीं हूँ
आज़ाद तू बेशक रहे सेंटर पे हमेशा
सर्किल में करूँ क़ैद मैं परकार नहीं हूँ
लफ़्ज़ों की बदल फेर है, बातें न नई कुछ
मैं साफ़ बताता हूँ सुख़न-कार नहीं हूँ
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निकला जन्नत से ये कफ़्फ़ार अभी ज़िंदा है
ऐ ख़ुदा तेरा गुनहगार अभी ज़िंदा है
ऐ ख़ुदा तेरा गुनहगार अभी ज़िंदा है
कौन कहता है कि दुनिया में ख़ुशी बाक़ी है
कौन माने है ये संसार अभी ज़िंदा है
यहाँ हर जिस्म को दरकार है इक ग़ैर बदन
यहाँ सब झूठ कहे प्यार अभी ज़िंदा है
थोड़ा सा और अभी खेलो मेरे दिल के साथ
शख़्स ये तड़पे है पर यार अभी ज़िंदा है
चाँद ने रौशनी सूरज से चुरा रक्खी है
ढलता सूरज कहीं उस पार अभी ज़िंदा है
मैं ने कुछ लोग भुलाने थे मगर याद आया
दिल को जो उन से था वो प्यार अभी ज़िंदा है
जिस की ख़ातिर था ख़रीदा न बिका बस वो ही
पेड़ काटा था मगर डार अभी ज़िंदा है
तीन दिन पहले जिसे मारा था तुम लोगों ने
पागलों का वही सरदार अभी ज़िंदा है
ग़म उसी का है जो हमदर्द बनाया था कभी
क्या करूँ जो मेरा ग़म-ख़्वार अभी ज़िंदा है
इक कहानी कि अधूरी रही कुछ ऐसे भी
मरे किरदार, क़लमकार अभी ज़िंदा है
दफ़्न वाँ ज़िंदा मुहब्बत की है दीवार चुनी
साल हा साल वाँ दीवार अभी ज़िंदा है
इक परी रेत के टीले में रहा करती है
लोग कहते है कि ये थार अभी ज़िंदा है
अब जो टूटा तो ये फिर सच में ही मर जाएगा
दिल ये बस आख़िरी ही बार अभी ज़िंदा है
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याद आती नहीं तेरी कब से
बात करनी नहीं तेरी अब से
बात करनी नहीं तेरी अब से
साथ चलता था पहले बे-मतलब
कॉल भी अब करे है मतलब से
हाँ मुहब्बत नहीं हुई लेकिन
दिल लगा ख़ूब यूँ मेरा सब से
इश्क़ ने मेरी रूह लूटी थी
जिस्म लूटा है इश्क़ का तब से
दुख सिगरेट पराए जिस्म शराब
बा'द क्या क्या तेरे, लगा लब से
ज़िंदगी में ख़ुदा बनाए कई
बन न पाई किसी भी मज़हब से
डूब पश्चिम में जाके जलते दिल
तू निकाला गया है पूरब से
मेरी मन्नत पराया माँग गया
राब्ता ख़त्म अब मेरा रब से
हुक्म माना नहीं न मानूँगा
कह दियो जाके अपने साहब से
नींद सुख चैन सब्र और 'कुनाल'
बैर इनका पुराना है शब से
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मैं आज तक सोचता यही हूँ तेरा कभी मैं हो क्यूँ न पाया
नहीं वफ़ा या नहीं मुहब्बत थी क्या कमी कुछ समझ न आया
नहीं वफ़ा या नहीं मुहब्बत थी क्या कमी कुछ समझ न आया
वही थी बातें नहीं कही जो वही जो कहनी कभी नहीं थी
मैं चुप था अपना समझ के उस को उसे मैं लगता रहा पराया
मैं रोज़ बाज़ार बिकने जाता कोई न क़ीमत मेरी लगाता
इन्हीं बदौलत हुआ ये सौदा गँवा के ख़ुद को ख़ुदी को पाया
मुझे नहीं तेरी जुस्तुजू अब नहीं रही कोई आरज़ू अब
मिरी बला से मरो या जी लो लो हाथ वापस तुम्हें थमाया
सुकूँ नहीं था न चैन सुख था, थे सब अकेले न कोई ख़ुश था
सभी को कोई न कोई दुख था, बुलंदियों पे मज़ा न आया
वो जिन को काफ़िर कहे है दुनिया, वो जिन से ज़िंदा हैं ऐब सारे
हमें भी उन
में से एक जानो कि सर न जिस ने कभी झुकाया
बहुत था क़ुदरत ने तो नवाज़ा मगर न ख़ुद को कभी तराशा
मिली न आवारगी से फ़ुर्सत, हुनर को मैं ने किया है ज़ाया'
थी जीती बाज़ी वही जो हारे, निशाने पर आके वो खड़ा था
लगाई तिगड़म सफल थी लेकिन मैं इश्क़ में चाल चल न पाया
इसी में जीवन सिमट रहा है ये प्यार किश्तों में बँट रहा है
नहीं मुहब्बत हो पाई साबुत कहाँ-कहाँ दिल न आज़माया
दुआएँ सज्दे सब इक जुआ हैं ख़ुदा ग़रीबों का कब हुआ है
उसी की पूरी रज़ा हुई है कभी भी जो माँगने न आया
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