ग़म कोई उस दिल में मुझ को यारों यूँ गहरा लगता है
गुमसुम सागर हलचल को थामे जैसे ठहरा लगता है
रखता है वो जज़्बे यूँ दिल में पोशीदा करके जैसे
साॅंपों का फ़ोता-ख़ाने पर ताकीदन पहरा लगता है
जब कोई जज़्बा है छेड़ा चुभती है उसकी गोयाई
बैठा है मुँह को फेरे यूँ मुझ को वो बहरा लगता है
ख़ामी है बेहद उस में फिर भी पाकीज़ा लगता है वो
नय्यर सा तारीकी में वो मुझ को तो ज़हरा लगता है
की है शादाबी की कोशिश आँखों के आँसू दे कर के
उस को है हसरत सावन की ता'मीर-ए-सहरा लगता है
ज़िंदगी से ज़िंदगी जब रूठ जाएगी सनम
ख़्वाब पाने के मुझे तुम देखना फिर सौ जनम
रात को हँसते मिलोगे नींद में बेफ़िक्र तुम
और उठते ही सवेरे फिर करोगे आँख नम
थे दिलासे झूठ सब देते नहीं अब धीर ये
हैं दुआ देकर के रोते अब मुझे सब पीर ये
तुम मुझे अब थाम लो मैं घुल रही हूॅं राख सी
हैं डुबोने में लगे बहते हुए अब नीर ये
थी कभी ज़िंदा मगर अब एक ज़िंदा लाश हूॅं
आज है बे-जान सी बे-रंग सी तस्वीर ये
इश्क़ है हैबत ये खा जाता अदम की रूह को
साँस अपने जिस्म की अब तो लगे ज़ंजीर ये
अब किसी से है नहीं शिकवा मुझे जो ग़म मिला
बेवफ़ा थी जब मिरी अपनी बुरी तक़दीर ये
जान से जाना मुझे था इश्क़ का दस्तूर है
लो अकेली रह गई राँझे बिना फिर हीर ये
यार बे-इंतिहा प्यार बस कर मुझे
मैं न खो दूॅं तुझे है यही डर मुझे
तू मुझे भर दे अब रौशनी से तेरी
कर गया हिज्र तेरा ये बंजर मुझे
राह तय मैं करूॅं अर्श से फ़र्श तक
कर गया है तेरा इश्क़ बेघर मुझे
फिर यक़ीं कर लिया क्यूँ भला इश्क़ पर
था मिरा दर्द ही यार बेहतर मुझे
रौशनी जो दिखाई वफ़ा की सनम
छोड़ना तुम नहीं बीच सागर मुझे
उनसे मोहब्बत यार फिर कोई ख़सारा तो नहीं
सब मैं लुटा आया मगर ईमान हारा तो नहीं
इतना इलाही है चलन हैरान हैं सब देख कर
वो है ग़लत फ़हमी में ये कोई सितारा तो नहीं
कर दे मुलाएम पाॅंव की मिट्टी निगाहें जोड़ कर
वसवास में हूॅं पैर के नीचे किनारा तो नहीं
जिस पर हुए हैं हम फ़िदा सारा जहाॅं यकसू करे
है तंग वो बेहाल है अब ये गवारा तो नहीं।
मुस्कान लब पर है लिए महबूब बेकल से खड़े
ये रंज बेचैनी मोहब्बत का इशारा तो नहीं
निगाहें लगाए निगह-दार की
ये चिलमन सलामत रहे यार की
हया-दार के मुंतज़िर हैं सभी
तलब है हसीना के दीदार की
के बातों में फिर आ गए यार हम
ये बस एक ग़लती कई-बार की
तवक़्क़ो रज़ा की दिखा कर मुझे
वफ़ा बे-वफ़ा ने लगातार की
मुझे फिर ख़ताकार एलान कर
ये मुजरिम निगाहें गिरफ्तार की
गवारा सितम है मुझे यार सब
के हद मैं ये देखूँ सितम-कार की
रिश्ता ये रेत वश यूँ हथेली में भर गया
गिरता रहा गिरफ़्त से दिल देख डर गया
इन सब में हादसे की तरह मैं गुज़र गया
हर ख़्वाब टूट कर के ज़मीं पर बिखर गया
बेहाल मैं समेट के फिर आबरू मेरी
सब कुछ लुटा के हाथ से बे-सब्र घर गया
करके जुदा नहीं ये परस्तार फिर रुका
अपना मिरा फ़रेब मुझी से ये कर गया
फिर मौत रू-सियाह ये हतमी इलाज है
मुल्ज़िम ये फिर से दश्त में वापस अगर गया
आना नहीं पलट के कभी तुम मिरी गली
जो था कभी निसार समझना के मर गया
गिरा कोई यहाँ कोई वहाँ मस्ती में है पूरी
कि मख़्मूरी में कैसे खो गई बस्ती ये है पूरी
हमारी है बुरी आदत कि हम मय ही नहीं पीते
नशा सज्दे में है बे-लौस सी हस्ती ये है पूरी
कभी भी मैं नहीं करता नज़ारा उन हसीनों का
झुका बस रब के आगे मैं कि सर-मस्ती ये है पूरी
ख़ुदा आना पड़ेगा आज तुम को अर्ज़ पर देखो
नहीं मैं अब न मानूँगा ज़बरदस्ती ये है पूरी
साथ चाहे दिया दो क़दम का
है करम मुझ पे काफ़ी सनम का
फ़ायदा देखते है जहाँ सब
वास्ता है ये बस एक ग़म का
बस रगों में उतरता लहू सा
है नहीं साफ़ चेहरा अदम का
बे-रिया क़ौल है सब सनम के
मैं बना यार शाकिर भरम का
फ़ाश कब थे नताएज मोहब्बत
सोग है इश्क़ हर एक दम का