ग़म कोई उस दिल में मुझ को यारों यूँ गहरा लगता है
गुम-सुम सागर हलचल को था
गुम-सुम सागर हलचल को था
में जैसे ठहरा लगता है
रखता है वो जज़्बे यूँ दिल में पोशीदा कर के जैसे
साॅंपों का फ़ोता-ख़ाने पर ताकीदन पहरा लगता है
जब कोई जज़्बा है छेड़ा चुभती है उस की गोयाई
बैठा है मुँह को फेरे यूँ मुझ को वो बहरा लगता है
ख़ामी है बेहद उस में फिर भी पाकीज़ा लगता है वो
नय्यर सा तारीकी में वो मुझ को तो ज़हरा लगता है
की है शादाबी की कोशिश आँखों के आँसू दे कर के
उस को है हसरत सावन की ता'मीर-ए-सहरा लगता है
Read Fullरखता है वो जज़्बे यूँ दिल में पोशीदा कर के जैसे
साॅंपों का फ़ोता-ख़ाने पर ताकीदन पहरा लगता है
जब कोई जज़्बा है छेड़ा चुभती है उस की गोयाई
बैठा है मुँह को फेरे यूँ मुझ को वो बहरा लगता है
ख़ामी है बेहद उस में फिर भी पाकीज़ा लगता है वो
नय्यर सा तारीकी में वो मुझ को तो ज़हरा लगता है
की है शादाबी की कोशिश आँखों के आँसू दे कर के
उस को है हसरत सावन की ता'मीर-ए-सहरा लगता है
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थे दिलासे झूठ सब देते नहीं अब धीर ये
हैं दुआ देकर के रोते अब मुझे सब पीर ये
हैं दुआ देकर के रोते अब मुझे सब पीर ये
तुम मुझे अब थाम लो मैं घुल रही हूँ राख सी
हैं डुबोने में लगे बहते हुए अब नीर ये
थी कभी ज़िंदा मगर अब एक ज़िंदा लाश हूँ
आज है बे-जान सी बे-रंग सी तस्वीर ये
इश्क़ है हैबत ये खा जाता अदम की रूह को
साँस अपने जिस्म की अब तो लगे ज़ंजीर ये
अब किसी से है नहीं शिकवा मुझे जो ग़म मिला
बे-वफ़ा थी जब मिरी अपनी बुरी तक़दीर ये
जान से जाना मुझे था इश्क़ का दस्तूर है
लो अकेली रह गई राँझे बिना फिर हीर ये
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यार बे-इंतिहा प्यार बस कर मुझे
मैं न खो दूँ तुझे है यही डर मुझे
मैं न खो दूँ तुझे है यही डर मुझे
तू मुझे भर दे अब रौशनी से तेरी
कर गया हिज्र तेरा ये बंजर मुझे
राह तय मैं करूँ अर्श से फ़र्श तक
कर गया है तेरा इश्क़ बेघर मुझे
फिर यक़ीं कर लिया क्यूँ भला इश्क़ पर
था मिरा दर्द ही यार बेहतर मुझे
रौशनी जो दिखाई वफ़ा की सनम
छोड़ना तुम नहीं बीच सागर मुझे
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रिश्ता ये रेत वश यूँ हथेली में भर गया
गिरता रहा गिरफ़्त से दिल देख डर गया
गिरता रहा गिरफ़्त से दिल देख डर गया
इन सब में हादसे की तरह मैं गुज़र गया
हर ख़्वाब टूट कर के ज़मीं पर बिखर गया
बेहाल मैं समेट के फिर आबरू मेरी
सब कुछ लुटा के हाथ से बे-सब्र घर गया
कर के जुदा नहीं ये परस्तार फिर रुका
अपना मिरा फ़रेब मुझी से ये कर गया
फिर मौत रू-सियाह ये हतमी इलाज है
मुल्ज़िम ये फिर से दश्त में वापस अगर गया
आना नहीं पलट के कभी तुम मिरी गली
जो था कभी निसार समझना के मर गया
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गिरा कोई यहाँ कोई वहाँ मस्ती में है पूरी
कि मख़्मूरी में कैसे खो गई बस्ती ये है पूरी
कि मख़्मूरी में कैसे खो गई बस्ती ये है पूरी
हमारी है बुरी आदत कि हम मय ही नहीं पीते
नशा सज्दे में है बे-लौस सी हस्ती ये है पूरी
कभी भी मैं नहीं करता नज़ारा उन हसीनों का
झुका बस रब के आगे मैं कि सर-मस्ती ये है पूरी
ख़ुदा आना पड़ेगा आज तुम को अर्ज़ पर देखो
नहीं मैं अब न मानूँगा ज़बरदस्ती ये है पूरी
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