ग़म कोई उस दिल में मुझ को यारों यूँँ गहरा लगता है

गुम-सुम सागर हलचल को था
में जैसे ठहरा लगता है

रखता है वो जज़्बे यूँ दिल में पोशीदा कर के जैसे
साॅंपों का फ़ोता-ख़ाने पर ताकीदन पहरा लगता है

जब कोई जज़्बा है छेड़ा चुभती है उस की गोयाई
बैठा है मुँह को फेरे यूँ मुझ को वो बहरा लगता है

ख़ामी है बेहद उस में फिर भी पाकीज़ा लगता है वो
नय्यर सा तारीकी में वो मुझ को तो ज़हरा लगता है

की है शादाबी की कोशिश आँखों के आँसू दे कर के
उस को है हसरत सावन की ता'मीर-ए-सहरा लगता है

— Rubball

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