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कोई बहाना क्या होता है
बात बनाना क्या होता है
बात बनाना क्या होता है
इश्क़ हुआ तब जाना हम ने
आँख चुराना क्या होता है
उस के जाने पर ये जाना
उस को पाना क्या होता है
उस को पाकर ये भी देखा
जूठा खाना क्या होता है
उस के ग़म में भूल गए हम
रोना गाना क्या होता है
ख़ाली हाथ चलो तब देखो
घर पर आना क्या होता है
बाप के मैं ने आँसू देखे
लकवा खाना क्या होता है
मैं ने इक विधवा से पूछा
रात का आना क्या होता है
शव से जा कर ये बोलूँगा
धरती का खाना क्या होता है
टूट गया जो तारा देखा
हद से जाना क्या होता है
Read Fullआँख चुराना क्या होता है
उस के जाने पर ये जाना
उस को पाना क्या होता है
उस को पाकर ये भी देखा
जूठा खाना क्या होता है
उस के ग़म में भूल गए हम
रोना गाना क्या होता है
ख़ाली हाथ चलो तब देखो
घर पर आना क्या होता है
बाप के मैं ने आँसू देखे
लकवा खाना क्या होता है
मैं ने इक विधवा से पूछा
रात का आना क्या होता है
शव से जा कर ये बोलूँगा
धरती का खाना क्या होता है
टूट गया जो तारा देखा
हद से जाना क्या होता है
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अभी मन भर गया है इस ज़मीं से
मुझे देखो निगाह-ए-वापसीं से
मुझे देखो निगाह-ए-वापसीं से
कफ़न पीले कलर का डाल देना
उन्हें दिखता नहीं हूँ मैं कहीं से
वो जब चाहे तुम्हें राजा बना दे
बचे रहिए निगाह-ए-पेश-बीं से
ग़ज़ल में मैं सदा मिलता रहूँगा
निकलकर सोहबत-ए-नाम-ओ-नगीं से
शराफ़त आप की अब दिख चुकी है
पसीना पोंछिए अपनी जबीं से
तरक़्क़ी बस तरक़्क़ी चाहता हूँ
मेरी है दुश्मनी सहरा-नशीं से
मुझे क्या एक दिन मौक़ा मिलेगा
कभी है पूछना अर्श-ए-बरीं से
अधर पर आग रख कर कह रहा हूँ
ज़बाँ भी खुल रही ज़ेर-ए-नगीं से
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हिम्मत ये तोड़ने को बराबर लगी हुई
बीमारी तेरे इश्क़ की है सर लगी हुई
बीमारी तेरे इश्क़ की है सर लगी हुई
दीवार देख कर भी निशानी नहीं मिली
है एक ऐसी कील जो भीतर लगी हुई
या आँख फोड़ दो या तो मंज़र बदल दो अब
जंगल की आग सीने से डटकर लगी हुई
मैदान से ये ख़्वाब भी पीछे नहीं हटे
और नींद भी है ऐसी बराबर लगी हुई
पहले तो माँगने पे कहीं छत नहीं मिली
चादर भी मिल सकी जो तो काकर लगी हुई
दिल खोल कर 'अशांत' मना जीत की ख़ुशी
इस जीत में अमान की पावर लगी हुई
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बात जब तक मेरे ज़बान में हैं
तीर सारे मेरे कमान में हैं
तीर सारे मेरे कमान में हैं
मुफ़्त में अब ख़रीद लाता हूँ
हसरतें जिस किसी दुकान में हैं
बात कुत्तों की ये नहीं सुनते
बच्चे हाथी के किस गुमान में हैं
ग़म मेरे साथ ऐसे रहते हैं
जाले जैसे मेरे मकान में हैं
लोग उतने मरे नहीं हैं अभी
तारे जितने इस आसमान में हैं
ज़ुल्म सहकर अधर नहीं खोले
एक अंकुश मिरे बयान में हैं
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वो जिस दिलबर को जाना था निकल जाने दिया मैं ने
मकीं को एक मेहमाँ में बदल जाने दिया मैं ने
मकीं को एक मेहमाँ में बदल जाने दिया मैं ने
उसे मैं जानता था ढील से जाने नहीं वाला
जकड़ कर रेत मुट्ठी से फिसल जाने दिया मैं ने
यहाँ तो धूप है इतनी मैं करता भी तो क्या करता
ज़मीं की प्यास थी सागर निगल जाने दिया मैं ने
लगा बीमार की हालत बदलने ही नहीं वाली
किया फिर यूँ कि मौसम ही बदल जाने दिया मैं ने
बसें स्कूल के बच्चों का बचपन छीन लेती है
नहीं भेजा उसे पैदल निकल जाने दिया मैं ने
मुझे बचपन की बैसाखी नहीं बनना था बच्चे की
उसे गिरकर मियाँ ख़ुद ही सँभल जाने दिया मैं ने
'अधर' पर आग थी इतनी ग़ज़ल कहता तो क्या कहता
हलक़ में आ गया जो हर्फ़ जल जाने दिया मैं ने
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तमाशा ज़िंदगी में कुछ बहुत करना पड़ेगा
ख़ुदाया बा'द इस के मौत का साया पड़ेगा
ख़ुदाया बा'द इस के मौत का साया पड़ेगा
मिरी माँ की इबादत थी तभी पैदा हुआ मैं
अभी बच्चों की इच्छा है मुझे मरना पड़ेगा
नए लड़के नहीं करते ख़ुदा का काम कोई
अभी गमलों में पानी बाप को भरना पड़ेगा
ख़ुदा का हुक्म है उस की इबादत ही करें हम
बताओ अब हमें महबूब से डरना पड़ेगा
सुला देना उसे बस हूर की गिनती गिनाकर
बताना मत कि सौदे में उसे मरना पड़ेगा
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