हुक्मरान इस बात से नाशाद है
हर किसी की क्यूँ ज़बाँ आज़ाद है
हर किसी की क्यूँ ज़बाँ आज़ाद है
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रूह तक में उतार कर तुम को
कौन जीता है मार कर तुम को
कौन जीता है मार कर तुम को
पाने वाला कभी न जानेगा
कैसा लगता है हार कर तुम को
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चले आओ मुझे मिलने कभी छुप कर ज़माने से
बहुत ही थक गया हूँ मैं तुम्हें हर पल बुलाने से
बहुत ही थक गया हूँ मैं तुम्हें हर पल बुलाने से
करूँ कब तक तेरी बातें चराग़ों से अँधेरों से
तू कर आ कर रिहाई अब मेरी इस क़ैद ख़ाने से
तुम्हें देखे बिना भी इश्क़ करते हैं तुम्हीं से हम
मुहब्बत मिट नहीं जाती किसी के दूर जाने से
कभी ख़ुद से, ही घंटों तक, तुम्हारी बात करते हैं
अकेले हो गए कितने तुम्हारे छोड़ जाने से
मुहब्बत हो अगर सच्ची कभी बूढ़ी नहीं होती
वो दिन भी लौट आएँगे तुम्हारे लौट आने से
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