Sagar Kaushik

Top 10 of Sagar Kaushik

    जो चाहे कर लो मगर तुम्हारी किसी जफ़ा का असर न होगा 
    मिरी इबादत वो शय है जिस पे तिरी अना का असर न होगा 

    विरह की अग्नि मिरे बदन को तपा रही है जला रही है 
    ये इश्क़ का है बुख़ार इस पे किसी दवा का असर न होगा

    मैं अपनी मर्ज़ी से उस की ज़द में हूँ  सो बता दूँ कि लोगों मुझ पर
    किसी बरहमन किसी नुजूमी किसी ख़ुदा का असर न होगा

    तू अब न डरना मेरी दुआ है तेरी बलाएँ मैं अपने सर लूँ
    ये कैसे मुमकिन है मेरी गुल-गूँ मेरी दुआ का असर न होगा
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    Sagar Kaushik
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    अक़्ल का पर्दा हटाया तो वो नज़र आया
    तेरी नज़रों से जो देखा तो वो नज़र आया
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    ग़लत को फ़र्ज़ कहते हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'
    ख़ुदा से दूर भागे हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

    ख़ुदा भी मुस्कुराता है फ़रिश्ते खिलखिलाते हैं
    यहाँ क्या-क्या तमाशे हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

    मुयस्सर है नहीं दो वक़्त की रोटी भी जिन को अब
    वही परचम उठाए हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

    ख़ुदा को भी ख़बर है क्या कि तुम इतने सियाने हो
    जो तुम ने शौक़ पाले हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'

    निठल्ले शोर करते हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'
    ख़ुदा चुप्पी सॅंभाले हैं ख़ुदा के नाम पर 'सागर'
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    Sagar Kaushik
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    ऐसा नहीं सहता नहीं
    बस तुम से कुछ कहता नहीं

    थोड़ी सी जो पी लूँ शराब
    औक़ात में रहता नहीं
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    एक पल और जीने की चाहत नहीं
    अब किसी से भी कोई शिकायत नहीं

    ज़िंदगी तू बता क्या ख़ता है मिरी
    क्यूँ मुझे एक पल की भी राहत नहीं

    ऐ ख़ुदा तू ने मुझ को बनाया ही क्यूँ
    इस जहाँ को मिरी जब ज़रूरत नहीं

    मैं खड़ा हूँ ज़मीरों के बाज़ार में
    आदमी की यहाँ कोई क़ीमत नहीं

    कौड़ियों में हुनर बेच आया हूँ मैं
    सिर्फ़ फ़न ज़िंदगी की ज़रूरत नहीं

    खु़द की नज़रों में इतना गिरा हूँ कि अब
    ख़ुद से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं

    उम्र भर की थकन का ये अंजाम है
    इक क़दम और चलने की ताक़त नहीं
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    ये शोर कश्मकश ये हंगाम कुछ नहीं है
    ये ताम-झाम साक़ी ये शाम कुछ नहीं है

    तुम से कोई शिकायत मैं क्यूँ करूँ भला जब
    मैं जानता हूँ इस का अंजाम कुछ नहीं है

    हर एक शय में वो ही ख़ुद साँस ले रहा है
    हर चीज़ याँ की अदभुत याँ आम कुछ नहीं है

    सब अपनी जेब भरने के इंतिज़ाम में हैं
    इन के लिए वतन औ' आवाम कुछ नहीं है

    इन सब के बा'द मुझ को मरना भी होगा क्या अब
    या'नी कि इस जतन का अंजाम कुछ नहीं है

    अच्छा ये नज़्में ग़ज़लें तो ठीक हैं चलो पर
    कुछ काम वाम भी या जी काम कुछ नहीं है
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    रात मेरे ख़्वाब में थी आज मुझ को वो मिली
    तीरगी में इक हसीं महताब सी जो थी खिली

    आज देखा है उसे मैं ने लिबास-ए-ईद में
    आज मुझ काफ़िर को भी है ईद की ईदी मिली

    उस की चौखट को नमन कर के मैं जब से आया हूँ
    देख कर हैरान हैं मेरी सभी ज़िंदा दिली

    जान पर अपनी बनी तो लोग चिल्लाने लगे
    कल तमाशा देखते थे ,सब ज़बानें थीं सिली

    नोंच डाला है उसे फिर से किसी हैवान ने
    इक सुगम सुंदर कली जो ताज़ा-ताज़ा थी खिली

    राम जी भी मुग्ध हो कर गालियाँ सुनते रहे
    इतनी मीठी इतनी पावन है हमारी मैथिली

    रात जागे से तुझे क्या मिल गया 'सागर' बता
    ये ग़ज़ल के चंद मिसरे, दुनिया भर की बे-दिली
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    Sagar Kaushik
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    सुनसान सड़क तन्हाई में
    इक रंज है इस पुरवाई में

    कल तक जो घिरा था लोगों से
    वो आज मरा तन्हाई में
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