Sagar Kaushik

Sagar Kaushik

@sagarkaushik1857

Sagar Kaushik shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sagar Kaushik's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

5

Content

36

Likes

38

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

भले दस्तरस में कई और हसीं हैं तुम्हारी कमी पर तुम्हारी कमी है — Sagar Kaushik
वो दरिया रोक कर बैठी है जाने कितने बरसों से मैं कब से आस में हूँ कब मिरा दामन भिगोएगी — Sagar Kaushik
यूँँ तो मेरा इश्क़ बहुत पाकीज़ा है लेकिन मेरी उम्र बहकने वाली है — Sagar Kaushik
जाह्नवी के तट पे तन्हा देखता है इक सितारा आसमाँ से ख़ुद को मुझ में — Sagar Kaushik
उस के उतने शे'र मुकम्मल होते हैं जिस ने जितनी ख़ाक उड़ाई होती है — Sagar Kaushik
तुम हो मधु का प्याला तुम को कब ये समझ में आएगा उम्र के साथ इस हुस्न का नश्शा और भी बढ़ता जाएगा — Sagar Kaushik
अक़्ल का पर्दा हटाया तो वो नज़र आया तेरी नज़रों से जो देखा तो वो नज़र आया — Sagar Kaushik
किसी को याद मेरी आ रही थी मैं उस की सम्त चलता जा रहा था — Sagar Kaushik
जो तुम सेे दूर जाने को किसी के पास जाता हूँ तुम्हारी याद तब कॉलर पकड़ कर खींच लेती है — Sagar Kaushik
अब मुझ को हर ओर सुनाई देता है सन्नाटे का शोर सुनाई देता है — Sagar Kaushik
क्यूँ इतना तू परेशाॅं होता है ऐ मिरी जाॅं मैं हूँ ना साथ तेरे ज़िंदा है तेरा 'सागर' — Sagar Kaushik

Ghazal

अपना सब सेे बड़ा दुश्मन-ए-जान हूँ मैं ही लंका हूँ और मैं ही हनुमान हूँ इतनी मुद्दत से हूँ मैं परेशाँ कि अब याद ये भी नहीं क्यूँ परेशान हूँ ऐ ख़ुदा ये कहाँ फेंक डाला मुझे मैं यहाँ के रिवाजों से अंजान हूँ ज़ख़्म दे पर ज़रा धीरे धीरे से दे थोड़ी रहमत बरत नन्ही सी जान हूँ ज़िंदगी से बड़ी है वो मेरे लिए दिल लुभाने का उस का मैं सामान हूँ मुझ को फ़न दुनियादारी का आता नहीं इस विषय में मैं थोड़ा सा नादान हूँ मैं नहीं जा रहा कुछ भी कहने उसे मैं भी कब तक सहूॅं मैं भी इंसान हूँ उस की नज़रों में क़ीमत मिरी कुछ नहीं जैसे मैं कोई मज़दूर की जान हूँ सब को अच्छा लगूॅं ये तो मुमकिन नहीं अब मैं क्या कोई दरबारी की तान हूँ — Sagar Kaushik
अच्छा हुआ मगर अभी उम्दा नहीं हुआ बर्बाद तो हुआ हूँ पर इतना नहीं हुआ वैसे तो कोई ख़ास ख़सारा नहीं हुआ बस ये हुआ कि प्यार दुबारा नहीं हुआ उस ने तो हम सेे कोई तअल्लुक़ नहीं रखा हम सेे मगर वो शख़्स पराया नहीं हुआ उस सेे शब-ए-फ़िराक़ में मेरे लिए कभी आँसू का एक क़तरा भी ज़ाया' नहीं हुआ सोहबत में उस की कमरा ये कमरा सा लगता था फिर उस के बा'द कमरा ये कमरा नहीं हुआ मैं मुतमइन भले ही नज़र आ रहा हूँ पर उस हादसे को यूँँ अभी हफ़्ता नहीं हुआ होता है कैसे इश्क़ ये कैसे पता चले कैसे कहें कि इश्क़ हुआ या नहीं हुआ तुम ने हमारे बच्चों के नख़रे उठाने थे तुम सेे तो मेरा फ़ोन उठाना नहीं हुआ — Sagar Kaushik
रात मेरे ख़्वाब में थी आज मुझ को वो मिली तीरगी में इक हसीं महताब सी जो थी खिली आज देखा है उसे मैं ने लिबास-ए-ईद में आज मुझ काफ़िर को भी है ईद की ईदी मिली उस की चौखट को नमन कर के मैं जब से आया हूँ देख कर हैरान हैं मेरी सभी ज़िंदा दिली जान पर अपनी बनी तो लोग चिल्लाने लगे कल तमाशा देखते थे ,सब ज़बानें थीं सिली नोंच डाला है उसे फिर से किसी हैवान ने इक सुगम सुंदर कली जो ताज़ा-ताज़ा थी खिली राम जी भी मुग्ध हो कर गालियाँ सुनते रहे इतनी मीठी इतनी पावन है हमारी मैथिली रात जागे से तुझे क्या मिल गया 'सागर' बता ये ग़ज़ल के चंद मिसरे, दुनिया भर की बे-दिली — Sagar Kaushik