ऐ ज़िंदगी बता मुझे क्या तेरा फ़लसफ़ा
क्यूँ रूठी हो बता भी दो क्या है मिरी ख़ता
ऐसा नहीं कि तुझ से मुझे कुछ भी न मिला
पर वक़्त के बहाव में सब छूटता गया
इतने अज़ाब झेले कभी उफ़ नहीं किया
ठोकर लगी तो गिर के उठा फिर से चल पड़ा
कौड़ी के भाव अपना हुनर बेच आया हूँ
मजबूरियों के सामने मैं कुछ न कर सका
पिंजरे में क़ैद कोई परिंदा नहीं हूँ मैं
तारों भरा ये आसमाँ है मेरा दायरा
— Sagar Kaushik















