मुझ सेे ज़्यादा मेरे जैसी लगती हो
तुम सचमुच में कितनी प्यारी लगती हो
कविताओं से प्यार है ग़ज़लों से नाता
तुम इस दौर में वही पुरानी लगती हो
मेरी मानो छोड़ दो ये सिगरेट नोशी
वैसे सिगरेट पीती अच्छी लगती हो
तुझ को क्या समझे है दुनिया क्या मालूम
'सागर' को तो नदी सरीखी लगती हो
— Sagar Kaushik















