दिन रात हर घड़ी में यूँँ तुम को याद करना
तुम कौन सी परी हो! क्यूँ तुम को याद करना?
है सोगवार कितना सोचो तुम्हीं ये मेरा
इक शहर में हो कर भी यूँ तुम को याद करना
तुम को मिरे दुखों का कुछ इल्म भी नहीं है
तुम मेरी कुछ नहीं हो! क्यूँ तुम को याद करना?
इस धूम्रदंडिका को, होंठों से यूँ लगा कर
मैं पूछता हूँ ख़ुद से क्यूँ तुम को याद करना?
— Sagar Kaushik















