मिलना इंसानों से अच्छा लगता है
भीड़ से तो फ़ासला ही अच्छा है
मेरे अंदर मुझ को अक्सर लगता है
सहमा-सा इक छोटा बच्चा रहता है
क्या वो मुझ से ज़्यादा अच्छा दिखता है?
क्या वो मुझ से अच्छी ग़ज़लें कहता है?
क्लब हो,मंदिर,चर्च,मस्जिद या शराब
दूर ख़ुद से जाने का इक रस्ता है
ज़िंदगी का तजरबा है जिस को वो
मुझ से मर जाने को 'सागर' कहता है
— Sagar Kaushik















