अपना सब सेे बड़ा दुश्मन-ए-जान हूँ
मैं ही लंका हूँ और मैं ही हनुमान हूँ
इतनी मुद्दत से हूँ मैं परेशाँ कि अब
याद ये भी नहीं क्यूँ परेशान हूँ
ऐ ख़ुदा ये कहाँ फेंक डाला मुझे
मैं यहाँ के रिवाजों से अंजान हूँ
ज़ख़्म दे पर ज़रा धीरे धीरे से दे
थोड़ी रहमत बरत नन्ही सी जान हूँ
ज़िंदगी से बड़ी है वो मेरे लिए
दिल लुभाने का उस का मैं सामान हूँ
मुझ को फ़न दुनियादारी का आता नहीं
इस विषय में मैं थोड़ा सा नादान हूँ
मैं नहीं जा रहा कुछ भी कहने उसे
मैं भी कब तक सहूॅं मैं भी इंसान हूँ
उस की नज़रों में क़ीमत मिरी कुछ नहीं
जैसे मैं कोई मज़दूर की जान हूँ
सब को अच्छा लगूॅं ये तो मुमकिन नहीं
अब मैं क्या कोई दरबारी की तान हूँ















