वो मेरे पास लौट के आता ही रह गया
मैं सोज़-ए-इंतिज़ार का मारा ही रह गया
तुम मेरी दस्तरस में नहीं हो तो क्या हुआ
मैं तो तुम्हारा ही था तुम्हारा ही रह गया
मुझ को बड़ा गुमान था तू मेरे साथ है
मैं तेरे साथ हो के भी तन्हा ही रह गया
छिप कर जो बैठा था मिरे अंदर शुरू से ही
ता-उम्र उस को मैं सदा देता ही रह गया
है रात काटनी अभी ऐ दोस्त और मुझे
दुख ये है अब गिलास में आधा ही रह गया
— Sagar Kaushik















