Kohar

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    गुम-शुदा कह कर मुझे जब तक तलाशा
    खुद में गुम मैं काफी अंदर तक गया था
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    हम ही जाने के किस तरह हमने
    कितने मुश्किल गुज़ारे अच्छे दिन
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    दर्द हद से गुज़र जा रहा
    ख़ुद पे मुझ को तरस आ रहा
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    ज़िक्र अब भी मेरा किया होगा
    नाम इक मरतबा लिया होगा

    ग़म उसे ना सहें गए हो जब
    जाम पे जाम फिर पिया होगा
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    गई जो जान तब, अब के नही जानी
    हसीं वो रात बीती फिर नही आनी
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    गिनती की हर सांस पर
    अब हो रही है रहगुज़र
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    जब से गया है छोड़ कर
    ग़म से रहा हूं तर बतर
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    ग़ैर से उम्मीद ही क्या
    कर मुहब्बत भी खुदी से
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    क्यूं नहीं
    मैं गम से पूछता
    तेरा खुशी से वास्ता क्यूं नहीं
    मोहब्बत भी है
    दोनों का एक रास्ता क्यूं नहीं

    जुदा हो कर भी वो मुझसे
    खुश क्यूं ना रहा
    वो मुझे दूर कर भी
    खुद से करीब क्यूं ना रहा

    उलझा रहता था मेरी वजह से
    अब मैं नहीं तो वो सुलझा क्यूं नहीं
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    हौंसला रख, देख हंस कर
    छोड़ ग़म को, जी खुशी से
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