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जब भी उस शोख़ लब-ए-लाल की लाली देखूॅंं उस की हर दीद में ईद और दिवाली देखूॅं
चाँद और आसमान कहते हैंहर सितारे में जगमगाती तुम
लिख रहा हूँ नई ग़ज़ल फिर से'तन्हा रातों में पास आती तुम'
हज़ारों तख्ति़यों पर है लिखा येख़ुदा है ग़र है वो मेहमान कोई
उड़ती पेड़ों से जब कोई चिड़ियाउसके बदले में चहचहाती तुम
ये काजल ये बिंदी ये लाली ये सुरमाअदाओं से अपनी गज़ब ढाने वाले
भले वो साथ थे कुछ पल सफ़र मेंन बाक़ी अब रहा अरमान कोई
बने इंसान अगर इंसान कोईरहे ग़म से न फिर अंज़ान कोई
उसे निकाह करना थामुझे विवाह करना था
उनसे सामना हो जाए अब,कोई मोजज़ा हो जाए अब