बात करने में जब ख़लल आया
सच ज़बाँ से भी तब निकल आया
सच ज़बाँ से भी तब निकल आया
वो मुझे टालता रहा अब तक
यार उस का कभी न कल आया
मेरी उम्मीद से बहुत जल्दी
वो ये चेहरा कहीं बदल आया
रोक पाते तो ही सही होता
आँख से अश्क ये उछल आया
कौन 'साकेत' जब सुना मैं ने
दूर ही से मैं फिर निकल आया
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आज इतना मलाल है मुझ को
वक़्त को जान मैं नहीं पाया
वक़्त को जान मैं नहीं पाया
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दिया है बोलने का आज ही मौक़ा
सितम ये आज भी चुप ही रहा हूँ मैं
सितम ये आज भी चुप ही रहा हूँ मैं
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उसी को था मुयस्सर भूल जाना
हमारे बस का ये सौदा नहीं है
हमारे बस का ये सौदा नहीं है
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ग़म नहीं हुआ तुझे जिताने का कभी मुझे
क़ाएदा नहीं पता हराने का अभी मुझे
क़ाएदा नहीं पता हराने का अभी मुझे
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उस को सब तिल भर लगता है
कुछ कहने पे डर लगता है
कुछ कहने पे डर लगता है
तब कोई जल्दी उस को थी
जैसे कोई कर लगता है
चलना मत उस रस्ते पर तुम
मुश्किल जो कमतर लगता है
उस की बातों से सुंदर है
दिल का ये मंज़र लगता है
छोड़ा बस ये कह कर साकेत
तुझ
में अब अंतर लगता है।
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