फ़िक्र-ए-काबा न बुत परस्ती है
मेरी अपनी ही मौज मस्ती है
मेरी अपनी ही मौज मस्ती है
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बड़ा अजब है अरे ये मंज़र कि इक निहत्ते के सर पे चढ़ कर
कभी तो अल्लाह का नारा देना कभी वो चिल्ला के राम कहना
कभी तो अल्लाह का नारा देना कभी वो चिल्ला के राम कहना
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एक तो आँखें तिरी यार हैं ख़ंजर जैसी
उस पे काजल भी लगा रक्खा है तौबा तौबा
शैख़ जी आप को आख़िर ये हुआ क्या है कहो
जाम हाथों में उठा रक्खा है तौबा तौबा
चंद पैसे के लिए आप ने क्यूँकर साहब
अपना ईमान गँवा रक्खा है तौबा तौबा
सीधे मुँह बात भी करते नहीं तुम तो हम से
ग़ैर को पास बिठा रक्खा है तौबा तौबा
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उस के कहने पे जलाई गई सारी बस्ती
तेरा कहना है कि सुलतान बड़ा अच्छा है
तेरा कहना है कि सुलतान बड़ा अच्छा है
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ये मत पूछो हम ने कितना ज़ब्त किया
तुम से बेहतर तुम से अच्छा ज़ब्त किया
तुम से बेहतर तुम से अच्छा ज़ब्त किया
इक आँसू भी इन पलकों पर आ न सका
अब के मैं ने अच्छा ख़ासा ज़ब्त किया
शायद कोई पूरी उम्र न कर पाए
तेरे हिज्र में मैं ने जितना ज़ब्त किया
इस दर्द को सह लेना कुछ आसान न था
या'नी तुम ने बेहद उम्दा ज़ब्त किया
मेरे जैसा कौन है मोनिस ये जिस ने
इतना उम्दा इतना आला ज़ब्त किया
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एक जानिब तो तेरी ज़ुल्फ़ खुली जाती है
दूसरी सिम्त मेरी अक़्ल उड़ी जाती है
दूसरी सिम्त मेरी अक़्ल उड़ी जाती है
ऐसा लगता है मिरी जान निकल जाएगी
रूठ कर मुझ से तू जिस वक़्त चली जाती है
रब ने मख़्लूक़ बनाई थी जो सब से बेहतर
हाए आपस में वो लड़ लड़ के मरी जाती है
आप ने झेला है लोगों का बहिष्कार फ़क़त
सच के कहने पे तो गर्दन भी चली जाती है
आप ज़िद्दी हैं मगर दिल के बहुत हैं अच्छे
बात जो कहने की है वो तो कही जाती है
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