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दुनिया बदल रही है
नगरी ये चल रही है
नगरी ये चल रही है
सब को बना कर अपना
बातों से जल रही है
रातों में हर दिए की
लौ भी दहल रही है
जो ज़िंदगी थी मेरी
लड़की फिसल रही है
बर्बाद कर के मुझ को
ख़ुद तो सँभल रही है
यादों के इस चमन में
कितना वो ढल रही है
ख़ुशियाँ मना रही थी
मुझ को निगल रही है
'जोहैर' क्या बताएँ
अब वो पिघल रही है
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हमें जी भर के पीने दो
कुछ और दिन मुझ को जीने दो
कुछ और दिन मुझ को जीने दो
ये ज़ख़्म-ए-हिज्र है यारा
इसे कुछ और सीने दो
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सर झुका कर मिलूँ मुझ को आता नहीं
इस लिए उस के दिल को मैं भाता नहीं
इस लिए उस के दिल को मैं भाता नहीं
इंतिहा के क़रीं है मोहब्बत मेरी
क्या करूँ मैं यक़ीं उस को आता नहीं
जो मेरे पास होकर भी मेरा नहीं
दर्द-ए-दिल में भी उस को सुनाता नहीं
ख़्वाब था संग उस के कटे ज़िंदगी
पर हक़ीक़त में वो पास आता नहीं
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इक दिया था ग़म में सजा हुआ अपने ही दम पर डटा हुआ
जिस की दीद थी मेरी ज़िंदगी वो कहीं पर है सजा हुआ
जिस की दीद थी मेरी ज़िंदगी वो कहीं पर है सजा हुआ
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