अपनी मीज़ान बनाया था कभी
ग़म को वीरान बनाया था कभी
इक जहान उस ने सजाया था कभी
हम को इंसान बताया था कभी
ख़ैर-ओ-शर जिस
में गिने जा सकते
ऐसा मीज़ान बनाया था कभी
जा के धरती पे बसेरा कर लो
उस को फ़रमान बनाया था कभी
जिस्म बेकार था मेरा जिस बिन
वो मेरी जान बनाया था कभी
— Zohair Ahmad Sahil















