सर झुका कर मिलूँ मुझ को आता नहीं
इस लिए उस के दिल को मैं भाता नहीं
इंतिहा के क़रीं है मोहब्बत मेरी
क्या करूँ मैं यक़ीं उस को आता नहीं
जो मेरे पास होकर भी मेरा नहीं
दर्द-ए-दिल में भी उस को सुनाता नहीं
ख़्वाब था संग उस के कटे ज़िंदगी
पर हक़ीक़त में वो पास आता नहीं
— Zohair Ahmad Sahil















