Nishant Singh

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    ख़ुद से ये बला टलती ही कहाँ मिरे सर से
    होता है नहीं तर्क-ए-इश्क़ बोलने भर से

    जो दिलासे के ख़ातिर ही जगह जगह बिखरा
    दिल वो क्यूँ ही चाहेगा कोई फिर घटा बरसे

    देख ये ख़लल फिर डालेगी मेरी ख़ल्वत में
    आ रही हवा ये जो तेरे जिस्म के दर से

    इस से पहले राएगाँ था हर एक घर में जो
    फूल हो गया बाहर आके आप के घर से

    आइना दिखाने पर हाल हो गया ऐसा
    कोई कुछ नहीं कहता सच को कहने के डर से
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    Nishant Singh
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    ख़ैरात में अब दे दिया जाए इसे
    हर रात नीदें ज़ाया' होती रहती हैं
    Nishant Singh
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    अब बिछड़ने पर समझ पाते हैं हम इक दूसरे को
    इम्तिहाँ के ख़त्म हो जाने पे हल याद आ रहा है
    Nishant Singh
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    सिर्फ़ इतनी सी गुंजाइश है वस्ल दिखने की
    जैसे इत्तिफ़ाक़न बारिश में धूप दिख जाए
    Nishant Singh
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    बारहा ये हकलाहट थोड़ा ध्यान से सुन लो
    हो सके तो दिल तुम से कुछ भी कह नहीं पाए
    Nishant Singh
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    उदास चेहरे पे इक नई उदासी छा गई
    पहरस पहले बाद-ए-सबा हमें जगा गई

    अजब नहीं जो लांछनों से मैं बरी न हो सकूँ
    सफ़ाई देने के समय ही मुझ को नींद आ गई
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    Nishant Singh
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    ख़ुशियों से परे
    मैं परे हूँ अब
    मैं परे हूँ उन सारी चीज़ों से
    जो वजह होती हैं मुस्कुराहटों की
    कोई तस्वीर,जो कम कर देती है उदासी को
    किसी की याद
    कि जिस के सहारे लोग उम्र गुज़ार देते हैं
    या फ़क़त इक उम्मीद
    एक रोज़ सब कुछ ठीक हो जाने की
    मैं बाहर हो चुका हूँ इन सारे ख़यालों से

    ये सब एक दिन में नहीं हुआ
    इक सिलसिला,जो चला आ रहा था कई हफ़्तों से
    मुस्तकिल हो गया अपने अंजाम पर पहुंचकर
    और ख़त्म कर दिया
    मेरे अंदर से मुझ को

    मगर फिर भी
    माहौल को बदलने के वास्ते
    इस सूख चुके ज़िंदगी में
    कोई नया वाक़िया आ कर
    पुराने वाक़िये से ध्यान हटा देता है
    ख़ुशी का सबब
    अब सिर्फ़ इतना रह गया है कि
    एक भारी दुख, हल्के दुख को दबा देता है
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    Nishant Singh
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