ख़ुशियों से परे

मैं परे हूँ अब
मैं परे हूँ उन सारी चीज़ों से
जो वजह होती हैं मुस्कुराहटों की
कोई तस्वीर,जो कम कर देती है उदासी को
किसी की याद
कि जिस के सहारे लोग उम्र गुज़ार देते हैं
या फ़क़त इक उम्मीद
एक रोज़ सब कुछ ठीक हो जाने की
मैं बाहर हो चुका हूँ इन सारे ख़यालों से

ये सब एक दिन में नहीं हुआ
इक सिलसिला,जो चला आ रहा था कई हफ़्तों से
मुस्तकिल हो गया अपने अंजाम पर पहुंचकर
और ख़त्म कर दिया
मेरे अंदर से मुझ को

मगर फिर भी
माहौल को बदलने के वास्ते
इस सूख चुके ज़िंदगी में
कोई नया वाक़िया आ कर
पुराने वाक़िये से ध्यान हटा देता है
ख़ुशी का सबब
अब सिर्फ़ इतना रह गया है कि
एक भारी दुख, हल्के दुख को दबा देता है

— Nishant Singh

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