दर्द हुआ है हल्का-हल्का ये तो बढ़ता जाएगा
दिल में ऐसी आग लगी है कौन बुझा ही पाएगा
पतझड़ को तो आना था
सावन को भी जाना था
फूल बड़े ही सुंदर थे
मौसम बड़ा सुहाना था
पानी जमकर बरसा था
बादल तिरा दिवाना था
धूल जमी थी सूरत में
आईना अनजाना था
बात चली थी लंबी कुछ
किस्सा बड़ा पुराना था
करना पड़ा बड़ा दिल को
उसका यही ठिकाना था
क्या ये मौसम बदलेगा
क्या ये पत्थर पिघलेगा
बिन बादल बरसातें हैं
दिन को सूरज निकलेगा