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पतझड़ को तो आना था
सावन को भी जाना था
सावन को भी जाना था
फूल बड़े ही सुंदर थे
मौसम बड़ा सुहाना था
पानी जमकर बरसा था
बादल तिरा दिवाना था
धूल जमी थी सूरत में
आईना अनजाना था
बात चली थी लंबी कुछ
क़िस्सा बड़ा पुराना था
करना पड़ा बड़ा दिल को
उस का यही ठिकाना था
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दिखता है जो सब झूठा है
जो छिप जाए वो मस्ताना
जो छिप जाए वो मस्ताना
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आँखों के काजल में
इश्क़ छिपा होता है
इश्क़ छिपा होता है
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क़ीमत क्या होगी उन आँखों की यारों
जिन की गहराई की कोई नाप नहीं
जिन की गहराई की कोई नाप नहीं
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