Janib Vishal

Top 10 of Janib Vishal

    दिन ढल चुका है प्यास में है रात समझिए
    इक शेर में है लाख इशारात समझिए

    दो दिन भी नहीं चल सका इक इश्क़ हमारा
    दो दिन में दिखा दी किसी ने जात समझिए

    कोई छुए तो प्यार से तोड़े तो अदब से
    इक फूल के नाज़ुक से ख़यालात समझिए

    मैं इश्क़ मुहब्बत को बुरा क्या ही कहूॅं पर
    गर एक तरफ़ से है बुरी बात समझिए

    दिल पर न चला हुक्म तो छूरी चला डाली
    यानी कि गिरे की गिरी औक़ात समझिए

    क्या था कि हुआ क्या है वजह कुछ तो है 'जानिब'
    बदला है अगर कोई तो हालात समझिए

    Janib Vishal
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    मैंने कुछ और कहा था तुम कुछ और समझ बैठे
    यानी भोपाल कहा था पर इंदौर समझ बैठे

    Janib Vishal
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    ज़माना चुभ रहा था और जीना ज़हर लगता था
    बहुत पीने लगा है जिसको पीना ज़हर लगता था

    बदन से ख़ून भी अब जो निकल जाए गॅंवारा है
    वही लड़का है ये जिसको पसीना ज़हर लगता था

    किसी के हाथ में टेडी किसी के फूल होते थे
    इधर मुझको मुहब्बत का महीना ज़हर लगता था

    कभी दिल में नहीं उतरा मुसाफ़िर जिस्म भर देखा
    समंदर को इसी कारण सफ़ीना ज़हर लगता था

    लुटा डाली थी मैंने ज़िंदगी जिस शख़्स के ख़ातिर
    उसे हर रास्ते चलता कमीना ज़हर लगता था

    चिलम से तो कभी मय से मिटा डाला मुजर्रद को
    मिला था वो गले मेरे सो सीना ज़हर लगता था

    जलाया और 'जानिब' को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर डाला
    ज़माने को चमकता इक नगीना ज़हर लगता था

    Janib Vishal
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    मौत का इंतिज़ार कब तक हो
    ज़िंदगी से पियार कब तक हो

    फूल दम तोड़ ही चुके सारे
    फिर चमन में बहार कब तक हो

    ठान ली है तबाह होना है
    दर्द सीने से पार कब तक हो

    तू निकलता नहीं है दिल से पर
    आस भी ग़म-गुसार कब तक हो

    कूदकर बस निकलने वाली है
    जान पर इख़्तियार कब तक हो

    पड़ चुकी है निगाह पर सूजन
    नींद से भी क़रार कब तक हो

    काम भी कोई है नहीं 'जानिब'
    अब गुज़ारा उधार कब तक हो

    Janib Vishal
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    मैं नहीं मानता जा तिरी बंदगी
    तू ख़ुदा है अगर सामने आ के मिल

    Janib Vishal
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    ये बहार-ए-सोग के ग़मनाक मंज़र मिल रहे हैं
    हम अगर ख़ुश मिल रहे तो ग़म छुपाकर मिल रहे हैं

    Janib Vishal
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    यार तुझको ख़ुदा का हवाला न दे
    ज़हर दे रुख़्सती का पियाला न दे

    क़ब्र मंज़ूर है तेरे दिल में मगर
    इस तरह इश्क़ को दिल निकाला न दे

    Janib Vishal
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    जो राज़ दिल में है दबा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर
    मैं ज़िंदगी को भी दगा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर

    तेरा वो बोसा अब भी मेरी अक़्ल से जाता नहीं
    हर इक निशां तेरा मिटा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर

    Janib Vishal
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    किसी शाम आना वहीं शाम लेकर
    मुहब्बत, शिकायत भरा काम लेकर

    उसी झील के छोर अब तक जहाँ पर
    दिया जल रहा है तिरा नाम लेकर

    Janib Vishal
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    जिंदगी जीत है, हार हरगिज़ नहीं
    फूल का भी ये श्रृंगार हरगिज़ नहीं

    दर्द हो या भले पीर पर्वत-सी हो
    मौत है हमको स्वीकार हरगिज़ नहीं

    Janib Vishal
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