दिन ढल चुका है प्यास में है रात समझिए
इक शेर में है लाख इशारात समझिए
दो दिन भी नहीं चल सका इक इश्क़ हमारा
दो दिन में दिखा दी किसी ने जात समझिए
कोई छुए तो प्यार से तोड़े तो अदब से
इक फूल के नाज़ुक से ख़यालात समझिए
मैं इश्क़ मुहब्बत को बुरा क्या ही कहूॅं पर
गर एक तरफ़ से है बुरी बात समझिए
दिल पर न चला हुक्म तो छूरी चला डाली
यानी कि गिरे की गिरी औक़ात समझिए
क्या था कि हुआ क्या है वजह कुछ तो है 'जानिब'
बदला है अगर कोई तो हालात समझिए
ज़माना चुभ रहा था और जीना ज़हर लगता था
बहुत पीने लगा है जिसको पीना ज़हर लगता था
बदन से ख़ून भी अब जो निकल जाए गॅंवारा है
वही लड़का है ये जिसको पसीना ज़हर लगता था
किसी के हाथ में टेडी किसी के फूल होते थे
इधर मुझको मुहब्बत का महीना ज़हर लगता था
कभी दिल में नहीं उतरा मुसाफ़िर जिस्म भर देखा
समंदर को इसी कारण सफ़ीना ज़हर लगता था
लुटा डाली थी मैंने ज़िंदगी जिस शख़्स के ख़ातिर
उसे हर रास्ते चलता कमीना ज़हर लगता था
चिलम से तो कभी मय से मिटा डाला मुजर्रद को
मिला था वो गले मेरे सो सीना ज़हर लगता था
जलाया और 'जानिब' को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर डाला
ज़माने को चमकता इक नगीना ज़हर लगता था
मौत का इंतिज़ार कब तक हो
ज़िंदगी से पियार कब तक हो
फूल दम तोड़ ही चुके सारे
फिर चमन में बहार कब तक हो
ठान ली है तबाह होना है
दर्द सीने से पार कब तक हो
तू निकलता नहीं है दिल से पर
आस भी ग़म-गुसार कब तक हो
कूदकर बस निकलने वाली है
जान पर इख़्तियार कब तक हो
पड़ चुकी है निगाह पर सूजन
नींद से भी क़रार कब तक हो
काम भी कोई है नहीं 'जानिब'
अब गुज़ारा उधार कब तक हो
ये बहार-ए-सोग के ग़मनाक मंज़र मिल रहे हैं
हम अगर ख़ुश मिल रहे तो ग़म छुपाकर मिल रहे हैं
यार तुझको ख़ुदा का हवाला न दे
ज़हर दे रुख़्सती का पियाला न दे
क़ब्र मंज़ूर है तेरे दिल में मगर
इस तरह इश्क़ को दिल निकाला न दे
जो राज़ दिल में है दबा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर
मैं ज़िंदगी को भी दगा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर
तेरा वो बोसा अब भी मेरी अक़्ल से जाता नहीं
हर इक निशां तेरा मिटा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर
किसी शाम आना वहीं शाम लेकर
मुहब्बत, शिकायत भरा काम लेकर
उसी झील के छोर अब तक जहाँ पर
दिया जल रहा है तिरा नाम लेकर
जिंदगी जीत है, हार हरगिज़ नहीं
फूल का भी ये श्रृंगार हरगिज़ नहीं
दर्द हो या भले पीर पर्वत-सी हो
मौत है हमको स्वीकार हरगिज़ नहीं