दिन ढल चुका है प्यास में है रात समझिए
इक शे'र में है लाख इशारात समझिए
दो दिन भी नहीं चल सका इक इश्क़ हमारा
दो दिन में दिखा दी किसी ने जात समझिए
कोई छुए तो प्यार से तोड़े तो अदब से
इक फूल के नाज़ुक से ख़यालात समझिए
मैं इश्क़ मुहब्बत को बुरा क्या ही कहूँ पर
गर एक तरफ़ से है बुरी बात समझिए
दिल पर न चला हुक्म तो छूरी चला डाली
या'नी कि गिरे की गिरी औक़ात समझिए
क्या था कि हुआ क्या है वजह कुछ तो है 'जानिब'
बदला है अगर कोई तो हालात समझिए
— Vishal Janib















