Janib Vishal

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Janib Vishal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Janib Vishal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये जो मैं हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा बस तुम्हारा ये जो तुम हो जहाँ के हो मगर मेरे नहीं हो — Janib Vishal
जान की बाज़ी अगर होती तो कोई बात होती इश्क़ कर के तुम मिरा बस वक़्त भर जाया करोगे — Janib Vishal
साल-दर-साल दिल तोड़ती आई है फ़रवरी का ये रोना नया तो नहीं — Janib Vishal
ये बहार-ए-सोग के ग़मनाक मंज़र मिल रहे हैं हम अगर ख़ुश मिल रहे तो ग़म छुपाकर मिल रहे हैं — Janib Vishal
इन्तिख़ाब-ए-इन्तिज़ार-ए-ज़न्न है दो में से किस का मौत ने भी और उस ने भी कहा है हम मिलेंगे — Janib Vishal
मैं ने कुछ और कहा था तुम कुछ और समझ बैठे या'नी भोपाल कहा था पर इंदौर समझ बैठे — Janib Vishal
मैं नहीं मानता जा तिरी बंदगी तू ख़ुदा है अगर सामने आ के मिल — Janib Vishal
वहीं घर फ़ोन से वो प्यार देती है मुझे अपना बिगाड़ा हो गया इतना कि मिलने आ नहीं सकती — Janib Vishal

Ghazal

शौक़ से देखी क़यामत चार दिन की ज़िंदगी में या'नी बस झूठी मुहब्बत चार दिन की ज़िंदगी में लोग गाली दे रहे हैं और ग़ुर्बत रोज़ तानें झेल ली हम ने फ़ज़ीहत चार दिन की ज़िंदगी में इश्क़ पैसा घर ज़रओज़ेवर कि गाड़ी नाम रुतबा यार क्याक्या है ज़रूरत चार दिन की ज़िंदगी में कामकाजी मसअले से जो मिले फ़ुर्सत कभी तो कीजिए उस की इबादत चार दिन की ज़िंदगी में चार दिन तो थे कि रहना था गले मिल कर हमें पर हम कि कर बैठें अदावत चार दिन की ज़िंदगी में एक जानिब है कहानी फ़िल्म या'नी झूठ ही झूठ दूसरी जानिब हक़ीक़त चार दिन की ज़िंदगी में — Janib Vishal
ज़माना चुभ रहा था और जीना ज़हर लगता था बहुत पीने लगा है जिस को पीना ज़हर लगता था बदन से ख़ून भी अब जो निकल जाए गॅंवारा है वही लड़का है ये जिस को पसीना ज़हर लगता था किसी के हाथ में टेडी किसी के फूल होते थे इधर मुझ को मुहब्बत का महीना ज़हर लगता था कभी दिल में नहीं उतरा मुसाफ़िर जिस्म भर देखा समुंदर को इसी कारण सफ़ीना ज़हर लगता था लुटा डाली थी मैं ने ज़िंदगी जिस शख़्स के ख़ातिर उसे हर रास्ते चलता कमीना ज़हर लगता था चिलम से तो कभी मय से मिटा डाला मुजर्रद को मिला था वो गले मेरे सो सीना ज़हर लगता था जलाया और 'जानिब' को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर डाला ज़माने को चमकता इक नगीना ज़हर लगता था — Janib Vishal
भरोसा ज़िंदगी का क्या न जाने कब बदल जाए पराए आदमी का क्या न जाने कब बदल जाए उतरते वक़्त पानी में किनारे पास ही रखना किसी बहती नदी का क्या न जाने कब बदल जाए छुपाकर रख रखा है दुख कि कल को काम आएगा घड़ी भर की ख़ुशी का क्या न जाने कब बदल जाए मई की धूप में भी हम निकलते हैं लिए छाता हवा की बे-रुख़ी का क्या न जाने कब बदल जाए बरसती हैं अगर ये आज तो खुलकर बरसने दो इन आँखों की नमी का क्या न जाने कब बदल जाए न जाने कब हवा बनकर चली आए सदा दर पर क़ज़ा की ख़ामुशी का क्या न जाने कब बदल जाए किसी दिन फिर मुहब्बत रास आएगी तुम्हें 'जानिब' कि इस बे-दिल-लगी का क्या न जाने कब बदल जाए — Janib Vishal
किस के नसीब में है सितारा उठाइए मैं या रकीब आप तो सिक्का उठाइए क्या चल रहा है पीठ के पीछे बताइए कुछ भी ग़लत नहीं है तो पर्दा उठाइए मेरे सिवा सहीह में चक्कर नहीं कहीं? मेरी क़सम न खाइये, गंगा उठाइए दिल पर वो बोझ है कि निकल जाए जान बस उतना ही बढ़ता जाता है जितना उठाइए इक बार में नहीं सुनी उस ने अगर सदा कुछ हो कमी कि कूक दुबारा उठाइए पानी की प्यास है कि है दरिया की प्यास या कतरा मिले जो प्यास को कतरा उठाइए हम को नहीं पसंद कि हो शर्मसार आप रखिए बदन को दूर कि माथा उठाइए पढ़ना था ज़िंदगी को सो छोड़ी नहीं किताब ग़ुर्बत तो रोज़ कहती थी बस्ता उठाइए 'जानिब' सुख़न में चैन है रोटी नहीं मगर जीने का अब तो और तरीक़ा उठाइए — Janib Vishal