सर्द मौसम है निगाहों में नमी है
अश्क मेरे कह रहे तेरी कमी है
महफ़िल-ए-'इशरत सजी है ख़ूब बाहर
ज़र्द-रू है दिल-जिगर अंदर ग़मी है
इक इशारा मार डाले या बचा दे
हाथ उस के जान अब मेरी थमी है
इश्क़ खो कर सादनी पर्वत बनी है
पूछ मत क्यूँ बर्फ़ की चादर जमी है
कौन पूछे हाल दिल का तब चमन से
हर कली जब अपने-अपने में रमी है
— Janib Vishal















