itni milti hai meri ghazalon se soorat teri | इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी

  - Bashir Badr

इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

  - Bashir Badr

Romantic Shayari

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    इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को
    अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को

    जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह
    फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को

    एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके
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    पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए
    रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को

    आब ओ ख़ाक ओ बाद में भी लहर वो आ जाए है
    सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को

    सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम
    इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को

    सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे
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    Bashir Badr
    मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा
    जाने क्या थी बात मैं जागा किया रोता रहा

    शबनमी में धूप की जैसे वतन का ख़्वाब था
    लोग ये समझे मैं सब्ज़े पर पड़ा सोता रहा

    वादियों में गाह उतरा और कभी पर्बत चढ़ा
    बोझ सा इक दिल पे रक्खा है जिसे ढोता रहा

    गाह पानी गाह शबनम और कभी ख़ूनाब से
    एक ही था दाग़ सीने में जिसे धोता रहा

    इक हवा-ए-बे-तकाँ से आख़िरश मुरझा गया
    ज़िंदगी भर जो मोहब्बत के शजर बोता रहा

    रोने वालों ने उठा रक्खा था घर सर पर मगर
    उम्र भर का जागने वाला पड़ा सोता रहा

    रात की पलकों पे तारों की तरह जागा किया
    सुब्ह की आँखों में शबनम की तरह रोता रहा

    रौशनी को रंग कर के ले गए जिस रात लोग
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    Bashir Badr
    मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे
    मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

    मिरे रास्तों में उजाला रहा
    दिए उस की आँखों में जलते रहे

    कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
    मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे

    सुना है उन्हें भी हवा लग गई
    हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे

    वो क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया
    मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

    मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी
    किराए के घर थे बदलते रहे

    लिपट कर चराग़ों से वो सो गए
    जो फूलों पे करवट बदलते रहे
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    Bashir Badr
    चराग़ों को आंखों में महफ़ूज़ रखना
    बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
    Bashir Badr
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    रात का इंतज़ार कौन करे
    आज कल दिन में क्या नहीं होता
    Bashir Badr
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