कुछ हरे कुछ कि लाल थे मुझ को
ग़म मिले भी कमाल थे मुझ को
रुख़्सती ने किसी की तोड़ा ही
और भी फिर मलाल थे मुझ को
मिल गया वो अगर तो पूछूँगा
कुछ जवाब-ओ-सवाल थे मुझ को
ज़िंदगी के हर एक रास्ते पर
रंज मिलते बहाल थे मुझ को
जो मुझे मारने चले हैं अब
वक़्त था इक कि ढाल थे मुझ को
मौत पर क्यूँ न सोचता तुझ को
और किस के ख़याल थे मुझ को
जीने के ख़्वाब ख़्वाब थे 'जानिब'
या कि मकड़ी के जाल थे मुझ को
— Janib Vishal















