मोती का दाम रखना तलबगार देखना

आसान भी नहीं कोई बाज़ार देखना

है बात दिल ही की तो परखना हज़ार बार
अच्छा सुनार देखना फिर हार देखना

क़िस्सा यही है रोज़ का मरने तलक मियाँ
इक फ़िल्म देखना कि लगातार देखना

सीने में दर्द है रखा है हाथ हाथ पर
आया नहीं हुज़ूर को बीमार देखना

हैं लाख बे-क़ुसूर मगर हैं ग़रीब हम
जिस ने भी देखना है गुनहगार देखना

ये भी रहेगा याद कि फूटा था सर यहीं
तस्वीर देखते हुए दीवार देखना

छुट्टी मिलेगी दो घड़ी दुनिया के काम से
जानिब कि आएगा कभी इतवार देखना

— Janib Vishal

More by Janib Vishal

Other ghazal from the same pen

See all from Janib Vishal →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling