ज़माना चुभ रहा था और जीना ज़हर लगता था

बहुत पीने लगा है जिस को पीना ज़हर लगता था

बदन से ख़ून भी अब जो निकल जाए गॅंवारा है
वही लड़का है ये जिस को पसीना ज़हर लगता था

किसी के हाथ में टेडी किसी के फूल होते थे
इधर मुझ को मुहब्बत का महीना ज़हर लगता था

कभी दिल में नहीं उतरा मुसाफ़िर जिस्म भर देखा
समुंदर को इसी कारण सफ़ीना ज़हर लगता था

लुटा डाली थी मैं ने ज़िंदगी जिस शख़्स के ख़ातिर
उसे हर रास्ते चलता कमीना ज़हर लगता था

चिलम से तो कभी मय से मिटा डाला मुजर्रद को
मिला था वो गले मेरे सो सीना ज़हर लगता था

जलाया और 'जानिब' को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर डाला
ज़माने को चमकता इक नगीना ज़हर लगता था

— Janib Vishal

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