
कौन है जो इस तरह अपना ही क़ातिल देखता है
रास्ते चलता मुसाफ़िर अपनी मंज़िल देखता है
ये निगाहें केश नथनी झुमके सारे हैं कहानी
फिर ग़ज़ल लिखता है जो उस का हसीं तिल देखता है
— Janib Vishal
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