इक सितम दिल पे बारहा होना

कम नहीं रोज़ हादिसा होना

किस तरह मान लूँ ख़ुदा उस को
भूल जाता है जो ख़ुदा होना

सोचिए मत कि मैं अकेला हूँ
आ गया मुझ को क़ाफ़िला होना

मैं बताऊँगा इक दफ़ा होकर
किस को कहते हैं लापता होना

ज़ख़्म भरने भी हैं तुझे 'जानिब'
जानता भी नहीं दवा होना

— Janib Vishal

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