अगरचे आबला-पाई से शिकवा है

किसे पर दश्त-पैमाई से शिकवा है

कहो मैं भी किसी से दिल लगा लूँ क्या
मुझे भी मेरी तन्हाई से शिकवा है

उतरना ही न था दरिया-ए-दिल में फिर
अगर इतना ही गहराई से शिकवा है

किसी भी फूल से झगड़ा नहीं मेरा
बस इक तितली के शैदाई से शिकवा है

शिकायत होनी थी बे-रंग दुनिया से
मगर 'जानिब' को बीनाई से शिकवा है

— Vishal Janib

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