घर जले बस्ती जले कुछ मत कहो बस चुप रहो
बात जो भी हो भले कुछ मत कहो बस चुप रहो
सुब्ह आए या चली जाए जहाँ में या कि फिर
शाम ढलती है ढले कुछ मत कहो बस चुप रहो
कान दोनों बंद कर लो या जगह ही छोड़ दो
कोई जब अपनी दले कुछ मत कहो बस चुप रहो
ये दिए का मसअला है सो दिया जाने इसे
तीरगी क्यूँ है तले कुछ मत कहो बस चुप रहो
जीत होगी हार होगी जो भी होगा ठीक है
चाल जब अपना चले कुछ मत कहो बस चुप रहो
ये ज़माना तो समझने से रहा जानिब कि फिर
दर्द जब सीना छले कुछ मत कहो बस चुप रहो
— Janib Vishal















