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इक उम्र तलक वहम ये पाले नहीं जाते
अब मुझ से मेरे ख़्वाब सँभाले नहीं जाते
अब मुझ से मेरे ख़्वाब सँभाले नहीं जाते
दिल में तो किया है घनी तारीकियों ने घर
इन आँखों से लेकिन ये उजाले नहीं जाते
ये दिन किसे मालूम मुयस्सर हों न हों फिर
दिन वस्ल के यूँ बे-दिली टाले नहीं जाते
ये दश्त-ए-मुहब्बत है तिरी दुनिया नहीं है
दिल में जो उतरते हैं निकाले नहीं जाते
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लब हैं ऐसे कि टहनी पर हों गुलाब
इस पे फिर ये बहार सा लहजा
कब शबिस्तान-ए- हिज्र में देखा
हमनवा साज़ हमनवा लहजा
दुनिया को चाहिए कहानी कोई
कौन समझा है दर्द का लहजा
हाँ किसे अच्छा लगता है ऐसा
बहका बहका बुझा बुझा लहजा
भूलने से भी भूलता नहीं है
याद है तेरा कज-अदा लहजा
गुनगुना ऐ दिल अपनी ही धुन तो
रख परिंदों में फाख़्ता लहजा
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सोचो तो जिस ख़राबे में जीना भी कुछ मुहाल था
मुझ को तिरा ख़याल था तुझ को मिरा ख़याल था
गुज़रे दिनों का क्या कहें क्या अजब इक ज़माना था
लोग भी बा-कमाल थे इश्क़ भी बा-कमाल था
क्या कहूँ तेरे इश्क़ में कैसा जुनून तारी था
तेरी जुदाई भी सनम मुझ को तिरा विसाल था
कैसे क़दम उठाते हम कूचा-ए-यार की तरफ़
पाँव भी कुछ निढाल थे हौसला भी निढाल था
दर्द के इस ख़राबे में अजनबी क़ैदख़ाने में
मरना कोई हुनर नहीं जीना मगर कमाल था
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मैं ख़ुद को खो रहा हूँ मुझ को बचाए कोई
मेरे वजूद का फिर सपना दिखाए कोई
मेरे वजूद का फिर सपना दिखाए कोई
वो दिल वो शहर-ए-उम्मीद वो गुल वो बाग़-ए-ख़ुर्शीद
वीरान हो चुका है उस को बसाए कोई
वो जिस को मैं अभी तक अपना वजूद कहता
मौजूद है कहीं तो मुझ को दिखाए कोई
अब तो मैं ख़्वाब-गर की हर बात से हूँ वाक़िफ़
जो दरमियाँ है पर्दा उस को हटाए कोई
दिल तो यूँ फूलों से भी उकता ही जाता है फिर
काँटों से रिश्ता आख़िर कब तक निभाए कोई
क्या है नसीब में गर बस इंतिज़ार ही है
यूँ भी जी लेंगे यारों आए न आए कोई
ज़िंदा-दिली ही तो है दश्त-ए-वजूद यारों
ये लोग ज़िंदा लाशें इनको जगाए कोई
मेरा भी ख़्वाब था ये जानाँ कभी यूँ भी हो
मैं रूठ जाऊँ मुझ को मुझ सा मनाए कोई
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मुझ सा इक शख़्स हू-ब-हू मुझ
में
में
करता है मेरी जुस्तजू मुझ
में
ख़ुद से भी दूर मैं चला आया
अब नहीं कोई आरज़ू मुझ
में
रौशनी का निशाँ भी बाक़ी नहीं
फैली है रात कू-ब-कू मुझ
में
कोई भी तो नहीं मेरे अंदर
करता है कौन गुफ़्तगू मुझ
में
मुझ
में मेरा मैं भी नहीं बाक़ी
इस क़दर आ बसा है तू मुझ
में
पड़ी है ऐसी हिज्र की सर्दी
जम गया है मिरा लहू मुझ
में
तू अगर कोई आरज़ू ही है
तेरी क्यूँ कर हो आरज़ू मुझ
में
जिस ने मेरे यक़ीं को मारा है
बैठा है क्यूँ वो क़िबला-रू मुझ
में
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ख़ुद से भी दूर मैं चला आया
अब नहीं कोई आरज़ू मुझ
में
रौशनी का निशाँ भी बाक़ी नहीं
फैली है रात कू-ब-कू मुझ
में
कोई भी तो नहीं मेरे अंदर
करता है कौन गुफ़्तगू मुझ
में
मुझ
में मेरा मैं भी नहीं बाक़ी
इस क़दर आ बसा है तू मुझ
में
पड़ी है ऐसी हिज्र की सर्दी
जम गया है मिरा लहू मुझ
में
तू अगर कोई आरज़ू ही है
तेरी क्यूँ कर हो आरज़ू मुझ
में
जिस ने मेरे यक़ीं को मारा है
बैठा है क्यूँ वो क़िबला-रू मुझ
में
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किसे मुजरिम कहूँ किस को सज़ा दूँ ऐ दिल-ए-मुंसिफ़
ख़ुद अपने हाथों से मैं ने जलाया है ये घर अपना
अभी इन कहकशाओं से बहुत आगे गुज़रना है
यूँ ही चलता रहे बस शब के ऐ तारो सफ़र अपना
यूँ दर्द-ए-दिल सुनाने को फ़साने हैं बहुत लेकिन
उसे फ़ुर्सत कहाँ रखना है क़िस्सा मुख़्तसर अपना
किसी से क्या गिला रक्खें किसी से क्या शिकायत हो
जिसे आना हो आ जाएँ खुला रहता है दर अपना
कोई उम्मीद क्या रक्खें इलाज-ए-दर्द-ए-उल्फ़त की
कि ख़ुद भी इस मरज़ में मुब्तला है चारा-गर अपना
गुज़रते वक़्त की धुन ने भी धुँधलाए नहीं मंज़र
हरा होता रहा पल पल वो यादों का शजर अपना
मैं शीशा हूँ सुना है तू भी शीशों का मसीहा है
लो आया टूट के मैं अब दिखा दे तू हुनर अपना
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रोज़ इक शख़्स मरता है मुझ
में
अपनी परवाह क्यूँ करूँ आख़िर
वो था ही कब जो मेरा है मुझ
में
अब कहीं कुछ धुआँ नहीं उठता
क्या ख़बर कौन जलता है मुझ
में
मेरा भी जी बहलता है उसी से
अब भला क्या अनोखा है मुझ
में
मुझ को इक लम्हा भी क़रार नहीं
जाने अब कौन टूटा है मुझ
में
ढूँढ़ता हूँ तेरा वजूद मगर
अपना ही आप बिखरा है मुझ
में
आग का एक दरिया है वो और
आग का दरिया बहता है मुझ
में
मेरी साँसों ज़रा पता तो करो
मुझी से कौन लड़ता है मुझ
में
बुझ नहीं सकता एक जाम से मैं
प्यास का जलता सहरा है मुझ
में
मैं किसी दुनिया में नहीं हूँ मगर
सच ये है सारी दुनिया है मुझ
में
इस भरी बज़्म में भी चैन नहीं
कोई तो है जो तन्हा है मुझ
में
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अपनी परवाह क्यूँ करूँ आख़िर
वो था ही कब जो मेरा है मुझ
में
अब कहीं कुछ धुआँ नहीं उठता
क्या ख़बर कौन जलता है मुझ
में
मेरा भी जी बहलता है उसी से
अब भला क्या अनोखा है मुझ
में
मुझ को इक लम्हा भी क़रार नहीं
जाने अब कौन टूटा है मुझ
में
ढूँढ़ता हूँ तेरा वजूद मगर
अपना ही आप बिखरा है मुझ
में
आग का एक दरिया है वो और
आग का दरिया बहता है मुझ
में
मेरी साँसों ज़रा पता तो करो
मुझी से कौन लड़ता है मुझ
में
बुझ नहीं सकता एक जाम से मैं
प्यास का जलता सहरा है मुझ
में
मैं किसी दुनिया में नहीं हूँ मगर
सच ये है सारी दुनिया है मुझ
में
इस भरी बज़्म में भी चैन नहीं
कोई तो है जो तन्हा है मुझ
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