MIR SHAHRYAAR

Top 10 of MIR SHAHRYAAR

    अब तू आए न आए अब तो मुझे
    अपने अंदर पनाह मिल गई है

    तुझ को पाने की जुस्तजू में मुझे
    ख़ुद में खोने की राह मिल गई है
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    10
    2 Likes
    इक उम्र तलक वहम ये पाले नहीं जाते
    अब मुझ से मेरे ख़्वाब सँभाले नहीं जाते

    दिल में तो किया है घनी तारीकियों ने घर
    इन आँखों से लेकिन ये उजाले नहीं जाते

    ये दिन किसे मालूम मुयस्सर हों न हों फिर
    दिन वस्ल के यूँ बे-दिली टाले नहीं जाते

    ये दश्त-ए-मुहब्बत है तिरी दुनिया नहीं है
    दिल में जो उतरते हैं निकाले नहीं जाते
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    7
    1 Like
    फूल सी बातें फूल सा लहजा
    कितना दिलकश है आप का लहजा

    लब हैं ऐसे कि टहनी पर हों गुलाब
    इस पे फिर ये बहार सा लहजा

    कब शबिस्तान-ए- हिज्र में देखा
    हमनवा साज़ हमनवा लहजा

    दुनिया को चाहिए कहानी कोई
    कौन समझा है दर्द का लहजा

    हाँ किसे अच्छा लगता है ऐसा
    बहका बहका बुझा बुझा लहजा

    भूलने से भी भूलता नहीं है
    याद है तेरा कज-अदा लहजा

    गुनगुना ऐ दिल अपनी ही धुन तो
    रख परिंदों में फाख़्ता लहजा
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    6
    1 Like
    दिल-ब-दिल इक मलाल था लब-ब-लब इक सवाल था
    यार हमारे दरमियाँ रिश्ता ही बेमिसाल था

    सोचो तो जिस ख़राबे में जीना भी कुछ मुहाल था
    मुझ को तिरा ख़याल था तुझ को मिरा ख़याल था

    गुज़रे दिनों का क्या कहें क्या अजब इक ज़माना था
    लोग भी बा-कमाल थे इश्क़ भी बा-कमाल था

    क्या कहूँ तेरे इश्क़ में कैसा जुनून तारी था
    तेरी जुदाई भी सनम मुझ को तिरा विसाल था

    कैसे क़दम उठाते हम कूचा-ए-यार की तरफ़
    पाँव भी कुछ निढाल थे हौसला भी निढाल था

    दर्द के इस ख़राबे में अजनबी क़ैदख़ाने में
    मरना कोई हुनर नहीं जीना मगर कमाल था
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    5
    2 Likes
    मैं ख़ुद को खो रहा हूँ मुझ को बचाए कोई
    मेरे वजूद का फिर सपना दिखाए कोई

    वो दिल वो शहर-ए-उम्मीद वो गुल वो बाग़-ए-ख़ुर्शीद
    वीरान हो चुका है उस को बसाए कोई

    वो जिस को मैं अभी तक अपना वजूद कहता
    मौजूद है कहीं तो मुझ को दिखाए कोई

    अब तो मैं ख़्वाब-गर की हर बात से हूँ वाक़िफ़
    जो दरमियाँ है पर्दा उस को हटाए कोई

    दिल तो यूँ फूलों से भी उकता ही जाता है फिर
    काँटों से रिश्ता आख़िर कब तक निभाए कोई

    क्या है नसीब में गर बस इंतिज़ार ही है
    यूँ भी जी लेंगे यारों आए न आए कोई

    ज़िंदा-दिली ही तो है दश्त-ए-वजूद यारों
    ये लोग ज़िंदा लाशें इनको जगाए कोई

    मेरा भी ख़्वाब था ये जानाँ कभी यूँ भी हो
    मैं रूठ जाऊँ मुझ को मुझ सा मनाए कोई
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    4
    2 Likes
    मुझ सा इक शख़्स हू-ब-हू मुझ
    में
    करता है मेरी जुस्तजू मुझ
    में

    ख़ुद से भी दूर मैं चला आया
    अब नहीं कोई आरज़ू मुझ
    में

    रौशनी का निशाँ भी बाक़ी नहीं
    फैली है रात कू-ब-कू मुझ
    में

    कोई भी तो नहीं मेरे अंदर
    करता है कौन गुफ़्तगू मुझ
    में

    मुझ
    में मेरा मैं भी नहीं बाक़ी
    इस क़दर आ बसा है तू मुझ
    में

    पड़ी है ऐसी हिज्र की सर्दी
    जम गया है मिरा लहू मुझ
    में

    तू अगर कोई आरज़ू ही है
    तेरी क्यूँ कर हो आरज़ू मुझ
    में

    जिस ने मेरे यक़ीं को मारा है
    बैठा है क्यूँ वो क़िबला-रू मुझ
    में
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    3
    2 Likes
    लबों को सी के हर दम पीता हूँ ख़ून-ए-जिगर अपना
    दर-ओ-दीवार से अब फोड़ता हूँ यारो सर अपना

    किसे मुजरिम कहूँ किस को सज़ा दूँ ऐ दिल-ए-मुंसिफ़
    ख़ुद अपने हाथों से मैं ने जलाया है ये घर अपना

    अभी इन कहकशाओं से बहुत आगे गुज़रना है
    यूँ ही चलता रहे बस शब के ऐ तारो सफ़र अपना

    यूँ दर्द-ए-दिल सुनाने को फ़साने हैं बहुत लेकिन
    उसे फ़ुर्सत कहाँ रखना है क़िस्सा मुख़्तसर अपना

    किसी से क्या गिला रक्खें किसी से क्या शिकायत हो
    जिसे आना हो आ जाएँ खुला रहता है दर अपना

    कोई उम्मीद क्या रक्खें इलाज-ए-दर्द-ए-उल्फ़त की
    कि ख़ुद भी इस मरज़ में मुब्तला है चारा-गर अपना

    गुज़रते वक़्त की धुन ने भी धुँधलाए नहीं मंज़र
    हरा होता रहा पल पल वो यादों का शजर अपना

    मैं शीशा हूँ सुना है तू भी शीशों का मसीहा है
    लो आया टूट के मैं अब दिखा दे तू हुनर अपना
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    2
    3 Likes
    अजब इक हश्र बरपा है मुझ
    में
    रोज़ इक शख़्स मरता है मुझ
    में

    अपनी परवाह क्यूँ करूँ आख़िर
    वो था ही कब जो मेरा है मुझ
    में

    अब कहीं कुछ धुआँ नहीं उठता
    क्या ख़बर कौन जलता है मुझ
    में

    मेरा भी जी बहलता है उसी से
    अब भला क्या अनोखा है मुझ
    में

    मुझ को इक लम्हा भी क़रार नहीं
    जाने अब कौन टूटा है मुझ
    में

    ढूँढ़ता हूँ तेरा वजूद मगर
    अपना ही आप बिखरा है मुझ
    में

    आग का एक दरिया है वो और
    आग का दरिया बहता है मुझ
    में

    मेरी साँसों ज़रा पता तो करो
    मुझी से कौन लड़ता है मुझ
    में

    बुझ नहीं सकता एक जाम से मैं
    प्यास का जलता सहरा है मुझ
    में

    मैं किसी दुनिया में नहीं हूँ मगर
    सच ये है सारी दुनिया है मुझ
    में

    इस भरी बज़्म में भी चैन नहीं
    कोई तो है जो तन्हा है मुझ
    में
    Read Full
    MIR SHAHRYAAR
    1
    4 Likes