तेरा लहजा बताता है तुझे कितनी मुहब्बत है
तू मुझ को मार सकता है तू मुझ पे मर नहीं सकता
तू मुझ को मार सकता है तू मुझ पे मर नहीं सकता
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मैं साफ़ बताता हूँ गुज़ारा नहीं होगा
फूलों पे अगर हक़ जो हमारा नहीं होगा
फूलों पे अगर हक़ जो हमारा नहीं होगा
जिस दर्जा भरी बज़्म से ये उठ के गया है
तुम देखना ये चाँद तुम्हारा नहीं होगा
तुम जाओ ज़रा ठीक से मौसम का पता लो
सावन का महीना है फुहारा नहीं होगा
कब कौन बदल जाएगा कुछ कह नहीं सकते
छोड़ेगी मुहब्बत तो गुज़ारा नहीं होगा
बचपन में बनाते थे जो साड़ी का किनारा
कुछ भी बना होगा वो किनारा नहीं होगा
मैं वो नहीं जो दोस्त की आवाज़ न पाऊँ
तू ठीक से ऐ दोस्त पुकारा नहीं होगा
मैं मानता हूँ तुम भी बिछड़ने पे दुखी हो
जो हाल हमारा है तुम्हारा नहीं होगा
तुम भी कभी उलझी हुई तस्वीर से निकलो
इस दर्द-ए-मुहब्बत से गुज़ारा नहीं होगा
मौका लगे तो चाँद को दीवाना बनाऊँ
मैं वो नहीं जो प्यार दुबारा नहीं होगा
हूरों के बदन पे भी ज़रा इत्र लगाओ
राकेश का बच्चों से गुज़ारा नहीं होगा
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आँख को बर्तन समझ लो
चाँद को कंगन समझ लो
चाँद को कंगन समझ लो
ये न पूछो आत्म क्या है
देह का दर्पण समझ लो
देख लो खिलते चमन को
देख कर जीवन समझ लो
मैं तुम्हें क्यूँ चाहता हूँ
एक प्यारा-पन समझ लो
हम जहाँ मिलते थे प्रियवर
अब उसे मधुबन समझ लो
रात मेरी क्या लगेगी
मौसमी दुश्मन समझ लो
रातरानी क्या लगेगी
मेरी इक दुल्हन समझ लो
फूल क्या है ख़ार क्या है
एक उर दो तन समझ लो
अब कभी मिलना न होगा
आख़िरी दर्शन समझ लो
चाहे कह लो कल्पना है
चाहे इस को फ़न समझ लो
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बिछड़ के लोग जो ख़ुश हैं उन्हें अल्लाह रक्खे
हमें दिखता नहीं है आसरा तो क्या करिए
मेरे बच्चों न ताको इश्क़ में रस्ता मेरा
है जब ये उम्र भर का रास्ता तो क्या करिए
हमारे प्यार की क़स
में सभी खाएँ लेकिन
हमारे बीच में हो फ़ासला तो क्या करिए
दम-ए-आख़िर भी दीवाना तेरा दर छोड़ा नइँ
मुहब्बत आख़िरी हो फ़ैसला तो क्या करिए
वो मुझ को दिल की दहलीज़ें नहीं चढ़ने देता
न मुझ को कहता है वो अलविदा तो क्या करिए
मेरे मौला मुझे कुछ जीने की ख़्वाहिश दे दे
कहीं भी दिल नहीं रमता मेरा तो क्या करिए
हमें सच में मुहब्बत रास नइँ आती बाबा
चलो हम हैं अज़ल से बे-वफ़ा तो क्या करिए
मेरे नन्हें गुलाबों अब तुम्हारा क्या होगा
पयम्बर हो गया हो सरफिरा तो क्या करिए
ज़रूरी तो नहीं हर बन्दा इक ही जैसा हो
चलो शाइ'र हुआ सब से जुदा तो क्या करिए
हमारे शे'र पढ़के तब्सिरा कर लो लोगों
हमें आती नहीं है रेख़्ता तो क्या करिए
क़यामत बा'द तुम से कौन बोलेगा 'राकेश'
ख़ुदा भी निकला जो तुम से ख़फ़ा तो क्या करिए
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वो दिल यूँ मेरा तोड़ के है मुतमइन बहुत
मैं भी हूँ बहुत ख़ुश कि मुझे घर नया मिला
मैं भी हूँ बहुत ख़ुश कि मुझे घर नया मिला
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मेरी दिलरुबा
तुम ख़ूब-सूरत हो
सूरत से नहीं सीरत से
मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है
इसीलिए सीरत का जानता हूँ
शर्म दहशत परेशानी
जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है
फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं
बहरहाल
मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं
ज़िंदा रहती हैं
मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए
मुझे चाहते हुए
मुझे सोचते हुए
और मेरे लिए परेशान होते हुए
वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है
ज़रूरी होता है
लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं
और निग़ाहें बात कर लेती हैं
मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी
पूछ लोगी
और तुम्हें जवाब मिलेगा
हाँ
मैं भी चाहता हूँ
ख़ूब चाहता हूँ
वैसे मैं भी
अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में
मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ
हालाँकि सदाक़त ये है
कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ
वैसे बुरा न मानना
कि मैं ने तुम से कभी इज़हार नहीं किया
सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है
ख़ैर
अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है
कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं
दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो
दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो
बहरहाल
तुम ख़ूब-सूरत हो
तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम सब से ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Read Fullतुम ख़ूब-सूरत हो
सूरत से नहीं सीरत से
मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है
इसीलिए सीरत का जानता हूँ
शर्म दहशत परेशानी
जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है
फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं
बहरहाल
मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं
ज़िंदा रहती हैं
मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए
मुझे चाहते हुए
मुझे सोचते हुए
और मेरे लिए परेशान होते हुए
वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है
ज़रूरी होता है
लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं
और निग़ाहें बात कर लेती हैं
मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी
पूछ लोगी
और तुम्हें जवाब मिलेगा
हाँ
मैं भी चाहता हूँ
ख़ूब चाहता हूँ
वैसे मैं भी
अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में
मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ
हालाँकि सदाक़त ये है
कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ
वैसे बुरा न मानना
कि मैं ने तुम से कभी इज़हार नहीं किया
सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है
ख़ैर
अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है
कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं
दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो
दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो
बहरहाल
तुम ख़ूब-सूरत हो
तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम सब से ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम ही ख़ूब-सूरत हो
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समुंदर के बहुत नज़दीक आ कर हम भी देखेंगे
किसी पर्दा-नशीं से दिल लगाकर हम भी देखेंगे
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हम ने चाहा जिसे ज़िन्दगी के लिए
दिल लगाया था वो दिल-लगी के लिए
दिल लगाया था वो दिल-लगी के लिए
आपने तो हमें ग़म ही ग़म दे दिया
आप को हम ने चाहा ख़ुशी के लिए
प्यार की रुत वो आ कर चली भी गई
चाँद भटका बहुत चाँदनी के लिए
दिल से मजबूर होकर जो हम रो पड़े
होंठ उस ने छुपाए हँसी के लिए
वो मुहब्बत के सागर में गोता किए
हम तरसते रहे इक ख़ुशी के लिए
आपने जान देने की क्यूँ ठान ली
कोई मरता नहीं है किसी के लिए
हम को करनी कहाँ थी मुहब्बत मगर
हम ने कर ली तुम्हारी ख़ुशी के लिए
दिल लगाए अगर तो निभाए उसे
है ज़रूरी बहुत आदमी के लिए
आशिक़ों की भी अपनी अना है मियाँ
दिल धड़कता नहीं हर किसी के लिए
सख़्त हो संग से पानी से हो तरल
वो जिगर चाहिए आशिक़ी के लिए
आप के हिस्से आया है शेर-ओ-सुखन
रात भर जागिए शा'इरी के लिए
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