Rakesh Mahadiuree

Rakesh Mahadiuree

@rakeshmahadiuree

Rakesh Mahadiuree shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rakesh Mahadiuree's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

शे'र मेरा सुन के अहल-ए-बज़्म तो ख़ामोश थी मेरे आगे लिखने वाले तब्सिरा करते रहे — Rakesh Mahadiuree
उस एक शख़्स को हम भूलने की कोशिश में न जाने कितनी दफ़ा उस को याद कर बैठे — Rakesh Mahadiuree
वो लड़का सूर्य था अपने समय का मुहब्बत खा गई फ़नकार साईं — Rakesh Mahadiuree
दोस्ती में माँ बहन की गालियाँ बकना सब सेे गन्दी ज़्यादती है दोस्ती के साथ — Rakesh Mahadiuree
जान-ए-मन मैं आइनों में भी तुम्हारा रूप देखता जो हूँ कभी तो इल्तिजा के साथ — Rakesh Mahadiuree
ग़ज़ल कहता हूँ और बारूद पे सिगरेट पीता हूँ अगर भूचाल भी आ जाए तो मैं डर नहीं सकता — Rakesh Mahadiuree
सबका मिलना दोस्त कहाँ हो पाता है हम जैसों को हसरत ज़िंदा रखती है — Rakesh Mahadiuree
नक़्ल किए तो वक़्त में मारे जाओगे सब को अपनी फ़ितरत ज़िंदा रखती है — Rakesh Mahadiuree
हूरों के बदन पे भी ज़रा इत्र लगाओ राकेश का बच्चों से गुज़ारा नहीं होगा — Rakesh Mahadiuree
क़ल्ब का नाम क़ल्ब होता है अक़्ल का नाम जी-हुज़ूरी है — Rakesh Mahadiuree
पहले सी दिल में हुस्न की चाहत नहीं बची देखा है हम ने हुस्न को इतने क़रीब से — Rakesh Mahadiuree
मुहब्बत चार दिन की चाँदनी है यहाँ सौ जन्म का अँधियार साईं — Rakesh Mahadiuree
तुम दिवाने लगते हो तुम कहाँ से आए हो तुम जहाँ भी बैठोगे रतजगा हो जाएगा — Rakesh Mahadiuree
हर ख़राब चीज़ में भी ठीक चीज़ है दुनिया भी हसीन है ये दिलरुबा के साथ — Rakesh Mahadiuree
जानवर को जानवर से उतनी भी नफ़रत नहीं आदमी को आदमी से जितनी नफ़रत हो गई — Rakesh Mahadiuree
तेरा लहजा बताता है तुझे कितनी मुहब्बत है तू मुझ को मार सकता है तू मुझ पे मर नहीं सकता — Rakesh Mahadiuree
उस आइने में हम तो सँवर भी नहीं सकते जिस आइने में अक्स तुम्हारा नहीं होगा — Rakesh Mahadiuree
हज़ारों सलाखों को हम तोड़ के आएँगे अगर तुम पुकारोगे सब छोड़ के आएँगे — Rakesh Mahadiuree
ले दे के ये ही एक हुनर अपने पास था हमलोग इश्क़ छोड़ के बेकार हो गए — Rakesh Mahadiuree

Ghazal

किसी से प्यार करते हो तो उस पे जाँ लुटाते हो तुम्हारी ये अदा अच्छी है तुम दिल से निभाते हो हमारे सामने तुम उस को यूँँ क्या क्या नहीं कहते मगर सुनते हैं जी तुम उस को शहज़ादी बुलाते हो अदाकारी ज़रूरी है मगर इतनी नहीं शाइ'र हमीं से प्यार करते हो हमीं से ग़म छुपाते हो मुहब्बत एक ख़ुशबू है छुपाए छुप नहीं सकती अदाकारी के पर्दे में हक़ीक़त क्यूँ छुपाते हो हमारे घर की बुनियादों में नफ़रत साँस लेती है हमारे घर के बच्चों को मुहब्बत क्यूँ सिखाते हो वो लड़की ख़ानदानी है तुम्हें कुछ कह नहीं पाती मगर 'राकेश' तुम उस को मियाँ काफ़ी सताते हो — Rakesh Mahadiuree
कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता मुझे या रब तेरी दुनिया में कुछ अच्छा नहीं लगता तुम्हारे साथ है कोई तो उस का ज़र्फ़ है जानी वगरना छोड़ जाने में कोई पैसा नहीं लगता बहुत लड़ते झगड़ते थे मगर अब जान पड़ता है तुम्हारे बिन मुझे इस शहर में अच्छा नहीं लगता मुहब्बत चार दिन की थी जवानी चार दिन की है मगर इस चार दिन में भी किसी को क्या नहीं लगता ग़ज़ल तहज़ीब जैसी है ये फ़न बारूद जैसा है कभी मिसरा नहीं लगता कभी नुक़्ता नहीं लगता मुहब्बत चार दिन की चाँदनी है फिर कहाँ होगी मगर ऐ बद्र साहब आदमी को क्या नहीं लगता ये दुनिया किस की होती है चलो सब को ही जाना है मगर 'राकेश' माँ बिन घर भी तो पूरा नहीं लगता — Rakesh Mahadiuree
आशिक़ की मुहब्बत का असर देख रहे हैं दीवानगी के हाथ में सर देख रहे हैं हम फूल में काँटों का हुनर देख रहे हैं क़ुदरत के करिश्में का असर देख रहे हैं तुम देख रहे हो यही टूटे हुए कुछ पर हम मौत की आँखों में भी डर देख रहे हैं मैं गाँव से लाया था इन्हें चाँद दिखाने ये सारे के सारे ही नगर देख रहे हैं सब कर रहे हैं शाह तेरे मौत पे मातम हम मारने वाले का जिगर देख रहे हैं तुम देख रहे हो किसी बदले की नज़र से हम टूटते चिड़ियों के भी पर देख रहे हैं दीवाने ने ऐलान बग़ावत का किया है और ज़िल्ल-ए-इलाही जी ख़बर देख रहे हैं तुम देख रहे हो किसी आकाश पे ख़ुद को हम बाप के साए का असर देख रहे हैं महबूब ने मिलने को क़यामत में कहा है सो हम भी खड़े राह-गुज़र देख रहे हैं 'राकेश' तेरे हाथों में हालात की ज़ंजीर देखी नहीं जाती है मगर देख रहे हैं — Rakesh Mahadiuree
न दौलत है न कारोबार साईं मेरी दुनिया है मेरा प्यार साईं मैं उस को धीरे धीरे जी रहा हूँ मेरी साँसें हैं वो रुख़सार साईं किसी टूटे हुए पत्ते की मानिंद ज़मीं पे आ गिरा अय्यार साईं मुझे जब से वो मिलने लग गए हैं गुलों की हो गई बौछार साईं मुहब्बत चार दिन की चाँदनी है यहाँ सौ जन्म का अँधियार साईं मुहब्बत कर के ऐसा लग रहा है मुहब्बत कर के हूँ बेदार साईं हमारे एक नाज़ुक दिल के ऊपर ज़माने भर का अत्याचार साईं मुझे मिलना हो तो फ़ुर्सत में मिलना मैं रहता हूँ पस-ए-दीवार साईं कई अच्छे भले ज़िंदा दिलों को मुहब्बत ने किया मिस्मार साईं शब-ए-फ़ुर्क़त में मेरे दिल के ऊपर ग़मों की हो गई बौछार साईं मैं अपनी हद से आगे आ गया हूँ कि इस के आगे है मेआ'र साईं ये दुनिया एक रंगीं मय-कदा है यहाँ हम तुम हैं बादा-ख़्वार साईं वो लड़का सूर्य था अपने समय का मुहब्बत खा गई फ़नकार साईं — Rakesh Mahadiuree
फूल बातें कर रहा था पंखुड़ी के साथ आदमी कितना बुरा है आदमी के साथ हम सफ़र की ग़लतियों पे हँस के आना पेश अक़्ल की मौजूदगी है सादगी के साथ दोस्ती में माँ बहन की गालियाँ बकना सब सेे गन्दी ज़्यादती है दोस्ती के साथ मुस्कुराने के लिए मत देखना कारण ज़िंदगी का नाम है जीना कमी के साथ फिर हमारे जीने का मतलब ही क्या होगा आप गरचे जाएँगे नाराज़गी के साथ वक़्त के उलझाव में रिश्तों को खो देना सब सेे गहरा हादसा है इस सदी के साथ अर्श पे अल्लाह है अंबर में है भगवान और ज़मीं पे आदमी है आदमी के साथ इस के आगे अक़्ल का भी दम नहीं चलता सब सेे अच्छी बात है दीवानगी के साथ भाग्य में चाहे हमारे जो भी लिक्खा हो अब तो जीना और मरना है उसी के साथ तुम मुझे इक बार बस आवाज़ दे देना मैं खड़ा हो जाऊँगा अपनी हँसी के साथ दौड़ती दुनिया के पीछे दौड़ते जाना अक़्ल की आवारगी है आदमी के साथ आप किस मुॅंह से नसीहत कर रहें राकेश आप की भी दोस्ती है फुलझड़ी के साथ — Rakesh Mahadiuree
राकेश जी छुप छुप के नज़ारा नहीं होगा और होगा भी तो इस सेे गुज़ारा नहीं होगा क़ुदरत ने बनाया है सभी के लिए इस को शाइ'र कभी ऐ दोस्त तुम्हारा नहीं होगा जितनी है चमक यार तेरे होने से मुझ में उतना कभी रौशन कोई तारा नहीं होगा जिस शख़्स को हर वक़्त ही अच्छे की तलब हो चालाक हो सकता है वो प्यारा नहीं होगा मैं चुप रहा तो चाँद ने अँगड़ाइयाँ मारी मैं बोल पड़ा प्यार दुबारा नहीं होगा बेशक किसी को चाहिए पर ध्यान ये रखिए बस प्यार मुहब्बत से गुज़ारा नहीं होगा उस आइने में हम तो सँवर भी नहीं सकते जिस आइने में अक्स तुम्हारा नहीं होगा मैं प्यार का बन्दा हूँ कि मुझ सेे न उलझ चाँद पानी भी मेरी आँख का खारा नहीं होगा — Rakesh Mahadiuree
लब को एक इबादत ज़िंदा रखती है जैसे देह को ताक़त ज़िंदा रखती है कभी कभी तो हम को ऐसा लगता है सब को अपनी क़िस्मत ज़िंदा रखती है पतझड़ भी अपने में सुंदर है लेकिन बाग़ों को भी रंगत ज़िंदा रखती है सबका मिलना दोस्त कहाँ हो पाता है हम जैसों को हसरत ज़िंदा रखती है इतनी ख़्वाहिश दोस्त मुकम्मल क्या होगी सब को एक शिकायत ज़िंदा रखती है नक़्ल किए तो वक़्त में मारे जाओगे सब को अपनी फ़ितरत ज़िंदा रखती है प्यार मुहब्बत सबकी तलब नहीं होती किसी किसी को नफ़रत ज़िंदा रखती है छोड़ के जिस्म निकल जाता पर सोचा हूँ मरे हुओं को तुर्बत ज़िंदा रखती है सब अपने में एक सिकंदर हैं लेकिन सब को अपनी क़ुदरत ज़िंदा रखती है उस दुनिया की और कहानी है लेकिन इस दुनिया को उल्फ़त ज़िंदा रखती है अपनी इक तस्वीर बनाओ लफ़्ज़ों से शाइ'र को इक शिद्दत ज़िंदा रखती है कोई पूछे कैसे हो तो ऐ 'राकेश' कह देना तुम चाहत ज़िंदा रखती है — Rakesh Mahadiuree
मुकम्मल दास्ताँ होना तो कुछ लुत्फ़-ए-सफ़र लेना मचल के उठ खड़े होना तड़प के आह भर लेना मुहब्बत में बहुत पाकीज़गी अच्छी नहीं होती ज़ियादा तो नहीं मिलना तो इक बोसा मगर लेना बुलंदी का सफ़र सुनते तो हैं मसरूफ़ियत का है अगर फिर भी समय निकले तो कुछ खोज़-ओ-ख़बर लेना समय का चक्र चलता है तो सब चीज़ें बदलती हैं किसी से प्यार जब करना तो वादे मुख़्तसर लेना मुकद्दर के भरोषे आदमी अब जी नहीं सकता अगर चुनने का मौका हो तो फिर दस्त-ए-हुनर लेना शिखर नापा नहीं मैं ने कभी अपनी बुलंदी का मेरी ताक़त का अंदाज़ा मेरे दुश्मन से कर लेना तुम्हें दो आँखें अब भी चाहती हैं गाँव में 'राकेश' पलट के गाँव जब जाना तो उन सेे बात कर लेना — Rakesh Mahadiuree
रहें जब दोस्तों के साथ चाहे कम सताते हो मगर जब तन्हा होते हैं हमें तुम याद आते हो बचाएँ कैसे हम ख़ुद को बताओ तो ज़रा जानाँ हमें तुम सेे मुहब्बत है हमें तुम ही सताते हो मुहब्बत कोई कितने दिन भुला के बैठ सकता है बहुत दिन हो गए बिछड़े कि अब तुम याद आते हो इसी दहलीज़ पे हम आज दम तोड़ेंगे ऐ साक़ी वहाँ से वो भगाता है यहाँ से तुम भगाते हो जला के अब तुम्हारा मय-कदा हम ख़ाक कर देंगे सुने हैं मय-कशों को तुम बहुत कम-कम पिलाते हो बहुत मजबूर होकर हम तुम्हारे दर पे आए हैं ज़रूरत-मंद हम भी हैं कि हम को क्यूँ भगाते हो यक़ीं है जब तुम्हें उन पर कि समझेंगे वो हाल-ए-दिल तो फिर राकेश तुम उन सेे मुहब्बत क्यूँ छुपाते हो — Rakesh Mahadiuree
ज़िंदगी के आख़िरी दिन यूँँ बिताऊँगा मैं नदी के इक किनारे घर बनाऊँगा तुम मुझे मिलने किसी शनिवार आ जाना मैं तुम्हारा रेत पे बिस्तर लगाऊँगा चाँदनी में लेट के तुम चाँद देखोगे फूल के काँधे पे मैं तितली बिठाऊँगा तुम मुझे दिल में छुपा के रख न पाओगे मैं तुम्हारे लब पे आके मुस्कुराऊँगा दूर हो तो प्यार का इज़हार क्या करना तुम कभी जब पास आओगे बताऊँगा उस सेे मिलने की तमन्ना है मुझे लेकिन वो अगर मिलने को आएगा तो जाऊँगा गर ख़ुदा मुझ को भी गढ़ने का हुनर दे तो मैं तुम्हारे हाथ का कंगन बनाऊँगा नाम पे विश्वास है तो सोच के रक्खो चाँद कहती हो तो इक दिन डूब जाऊँगा रो रही हो तुम मेरे परदेस जाने पे क्या तुम्हें लगता है मैं वापस न आऊँगा ये मुलाक़ातें भी काफ़ी हैं मुहब्बत में कौन कहता है कि तुम को भूल जाऊँगा तुम मुझे बर्बाद कर के ख़ुश हो तो आमीन तुम हुए बर्बाद तो मैं याद आऊँगा उम्र भर अब कौन किस को याद रखता है धीरे धीरे मैं भी तुम को भूल जाऊँगा सारी दुनिया अपने ग़म से रो रही 'राकेश' मैं तुम्हारा ग़म इन्हें कैसे सुनाऊँगा — Rakesh Mahadiuree
राह चलते जा रहे हैं बे-वफ़ा के साथ ख़त्म हो न ज़िंदगी ये हादसा के साथ जान-ए-मन मैं आइनों में भी तुम्हारा रूप देखता जो हूँ कभी तो प्रार्थना के साथ आते जाते लोगों में हैं अपनों के निशान डाँटते भी हैं अगर तो मशवरा के साथ हर ख़राब चीज़ में भी ठीक चीज़ है दुनिया भी हसीन है ये दिलरुबा के साथ ये ग़रीब लोग क्या ही मुँह लगेंगे साब ये तो हक़ भी माँगते हैं प्रार्थना के साथ जाते जाते उस का नाम याद रह गया अब ये रिश्ता ख़त्म समझो राब्ता के साथ हम किसी अमीर घर के पेड़ तो नहीं हम को ख़्वाब देखना है रास्ता के साथ हम तो एक लड़की को भी पा नहीं सके जाने कैसे लोग होंगे अप्सरा के साथ — Rakesh Mahadiuree
अपनो में रहते हुए ग़ैरों से सोहबत हो गई जाने अंजाने में हम सेे ये शरारत हो गई तुम न मानो ये तुम्हारी अक़्ल है मेआ'र है मैं तो अब भी कह रहा मुझ को मुहब्बत हो गई तुम किसी का नाम ले के क्यूँ चिढाओगे उसे अब दिवानो देखना अब तो बग़ावत हो गई जब मशीनें आदमी के दिल को नइँ अपना सकीं आदमी को आदमी की तब ज़रूरत हो गई मैं बहुत पहले से तुम को चाहता था या कि यूँँ बस तुम्हारे छूने से मुझ को मुहब्बत हो गई कोई आख़िर कब तलक ही कर्म के विपरीत हो लाख दीवाना रुका पर रक़्स-ए-वहशत हो गई राज़ जब हमपे खुला तो हम भी हैराँ हो गए कैसे कोई ग़ैर मर्ज़ी अपनी क़िस्मत हो गई इस बदलते दौर की तस्वीर को भी देखिए दुनिया को अब प्यार की कितनी ज़रूरत हो गई जानवर को जानवर से उतनी भी नफ़रत नहीं आदमी को आदमी से जितनी नफ़रत हो गई — Rakesh Mahadiuree
मेरे एहसास की ख़ुशबू से गर तू तर नहीं सकता तो जानाँ छू के भी मुझ को तू पागल कर नहीं सकता तेरा लहजा बताता है तुझे कितनी मुहब्बत है तू मुझ को मार सकता है तू मुझ पे मर नहीं सकता कहीं पे बैठ के तन्हाइयों में ख़ूब रोता है जो बेटा बाप के बोझे को हल्का कर नहीं सकता ग़ज़ल कहता हूँ और बारूद पे सिगरेट पीता हूँ अगर भूचाल भी आ जाए तो मैं डर नहीं सकता हमेशा मौत का खटका कि उस पे ये सितम भी है बिना उस की इजाज़त के कोई भी मर नहीं सकता बिताई उम्र है मैं ने जी ऐसे बे-वफ़ा के साथ मैं जिस को मार नइँ सकता मैं जिस पे मर नहीं सकता बड़े घर का नहीं मैं अपने घर का हूँ बड़ा बेटा किसी की बे-वफ़ाई पर तो हरगिज़ मर नहीं सकता जिसे इक बार तकने से मैं तर जाता था ऐ राकेश मुझे वो मिल भी जाएगा तो मैं अब तर नहीं सकता — Rakesh Mahadiuree
मैं साफ़ बताता हूँ गुज़ारा नहीं होगा फूलों पे अगर हक़ जो हमारा नहीं होगा जिस दर्जा भरी बज़्म से ये उठ के गया है तुम देखना ये चाँद तुम्हारा नहीं होगा तुम जाओ ज़रा ठीक से मौसम का पता लो सावन का महीना है फुहारा नहीं होगा कब कौन बदल जाएगा कुछ कह नहीं सकते छोड़ेगी मुहब्बत तो गुज़ारा नहीं होगा बचपन में बनाते थे जो साड़ी का किनारा कुछ भी बना होगा वो किनारा नहीं होगा मैं वो नहीं जो दोस्त की आवाज़ न पाऊँ तू ठीक से ऐ दोस्त पुकारा नहीं होगा मैं मानता हूँ तुम भी बिछड़ने पे दुखी हो जो हाल हमारा है तुम्हारा नहीं होगा तुम भी कभी उलझी हुई तस्वीर से निकलो इस दर्द-ए-मुहब्बत से गुज़ारा नहीं होगा मौका लगे तो चाँद को दीवाना बनाऊँ मैं वो नहीं जो प्यार दुबारा नहीं होगा हूरों के बदन पे भी ज़रा इत्र लगाओ राकेश का बच्चों से गुज़ारा नहीं होगा — Rakesh Mahadiuree

Nazm

"शाइराना मिज़ाज" अबकि पास आए हो ख़ुश्बूओं के साए हो कल तलक तो मेरे थे आज तुम पराए हो उम्र भर की चाहत की रुख़्सती नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते सादगी से आओगे बे-रुखी से जाओगे मेरे पास आए हो किस का दिल दुखाओगे दिलजलों से जान-ए-जानाँ दिल-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार मुस्कुराए थे फूल मुँह बनाए थे मैं ने ख़्वाब बेंचा था मैं ने दिल उगाए थे मैं कि जैसे करता था आदमी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है जानाँ मेरे जैसों से मुँह-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते हुस्न पे लिबादा है दर्द भी कुशादा है ज़ेहन का तो फिर भी ठीक दिल नहीं अमादा है यूँँ पराई रौशनी से रौशनी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार बोए जाएँगे ख़ाक अब उड़ाएँगे मैं ने तुम को चाहा था और अब भुलाएँगे तुम सेे बैर नहीं करते प्यार भी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते दिल से आगे जाना है पेट चुन के आना है हाथ जिस का थामा है उम्र भर निभाना है उम्र भर के साथी को यूँँ दुखी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते — Rakesh Mahadiuree
"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा — Rakesh Mahadiuree
"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो — Rakesh Mahadiuree
तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये — Rakesh Mahadiuree