फूल से तितलियों को उड़ाते हुए
शख़्स इक रो दिया मुस्कुराते हुए
दूर जाते हुए ये भी सोचा नहीं
पास आए थे हम कँपकपाते हुए
अपने हिस्से में भी कुछ मरे फूल हैं
हम भी जाएँगे दुनिया से गाते हुए
सोचो उनपे मुहब्बत में क्या बीती है
लोग हँसते हैं जो चोट खाते हुए
जाने क्या बात मुझ
में है ऐसी ख़ुदा
लोग रोते हैं मुझ को मनाते हुए
कुछ ख़ुदा की नज़र भी उधर को गई
ओढ़नी जब गिरी गुल उठाते हुए
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