"हाल-ए-दिल"
मेरी दिलरुबा
तुम ख़ूब-सूरत हो
सूरत से नहीं सीरत से
मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है
इसीलिए सीरत का जानता हूँ
शर्म दहशत परेशानी
जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है
फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं
बहरहाल
मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं
ज़िंदा रहती हैं
मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए
मुझे चाहते हुए
मुझे सोचते हुए
और मेरे लिए परेशान होते हुए
वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है
ज़रूरी होता है
लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं
और निग़ाहें बात कर लेती हैं
मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी
पूछ लोगी
और तुम्हें जवाब मिलेगा
हाँ
मैं भी चाहता हूँ
ख़ूब चाहता हूँ
वैसे मैं भी
अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में
मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ
हालाँकि सदाक़त ये है
कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ
वैसे बुरा न मानना
कि मैं ने तुम से कभी इज़हार नहीं किया
सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है
ख़ैर
अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है
कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं
दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो
दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो
बहरहाल
तुम ख़ूब-सूरत हो
तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम सब से ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो
तुम ही ख़ूब-सूरत हो















