Ankit Dixit

Top 10 of Ankit Dixit

    उठा हैं दिल में सौ दफ़ा ख़याल उस मलाल का
    मैं रोज़ रात सोचता वो इश्क़ था कमाल का

    हथेलियाँ निहारते वो वक़्त भी गुज़ार दी
    मिला था इत्तिफ़ाक़ से जो पल मुझे विसाल का

    उसे न कुछ कहे कोई जो इश्क़ ले मेरी ये जान
    क़सूर हो तो सिर्फ़ मेरे ख़ून के उबाल का

    सितम जो भी मिला मुझे लिखा था वो नसीब में
    किसी से क्यूँ गिला करें हम इस दिल-ए-निढाल का

    उसे भी कुछ दिखा नहीं मैं ने भी सिर्फ़ लिख दिया
    जो हाल मेरे दिल का था जो हाल था रुमाल का

    बिठा के तुम को इक जगह निहारना है बस मुझे
    हैं देखना कि क्या कोई हैं अंत इस जमाल का

    ये पूछना था अर्ज़ को जो ज़ेहन में सवाल हैं
    उठा ले फ़ोन और फिर जवाब दे सवाल का
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    थपेड़े वक़्त के बे-शक वो हँस-कर सह भी सकता था
    मगर कुछ पल में ही दीवार तन्हा ढह भी सकता था

    यक़ीनन कश्मकश होगी अजी कुछ सिलसिले होंगे
    ये मेरी आँख का आँसू तो बाहर बह भी सकता था

    तुम्हें ही चाहता हूँ मैं तुम्हें ही चाहता है दिल
    रहा ख़ामोश मैं जब कि तुम्हें ये कह भी सकता था

    ये उस का फ़ैसला था रास्ते को छोड़ देते हैं
    उसी रस्ते पे लेकिन मैं सहर तक रह भी सकता था
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    जीते जी लेता रहा मैं नाम उस का
    मरते दम आया नहीं पैग़ाम उस का

    उम्र-भर ख़ुद को बताता रह गया मैं
    पास जा, फिर हाथ फट से थाम उस का

    उफ़ ये बेचैनी ये मेरी छटपटाहट
    कर न पाए आज तक इक काम उस का

    और मेरी ज़िंदगी में क्या मिलेगा
    दर्द आँसू जो भी है इन'आम उस का

    आज सब-कुछ हार कर के सोचता हूँ
    चल पड़ूँ मैं जिस तरफ़ हैं धाम उस का
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    दिल ये समझो कि खोया तो पल-भर में था
    पर वो लम्हा तो सालों से मंज़र में था

    एक दरिया ने छोड़ा था तन्हा जिसे
    अब वो कतरा कहीं इक समुंदर में था

    मैं नहीं कह रहा उस का पत्थर हैं दिल
    पर ये मुमकिन हैं दिल उस का पत्थर में था

    जिस के ख़ातिर ही सूरज जला उम्र-भर
    चाँद वो रात के बस मुकद्दर में था

    साथ उस के कहीं मैं पहाडों में हूँ
    नींद टूटी तो देखा कि बिस्तर में था

    मैं तो मरता हुआ भी दुआ दे गया
    ख़ून देखा जो उस के ही ख़ंजर में था
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    ज़माने से जुदा होकर के ख़ुद से आशिक़ी अच्छी लगी
    मुझे तो ग़म में तेरे जान-ए-जाँ ये ज़िंदगी अच्छी लगी

    गुज़िश्ता साल अपनी बेबसी पर हँसते थे हैरान थे
    हुआ इक रोज़ फिर ऐसा मुझे अपनी हँसी अच्छी लगी

    भरोसा बारहा तुम पर किया अपना सभी कुछ वार कर
    सितम ऐसे मिले तुम से कि दिल को खुद-कुशी अच्छी लगी

    हमारे महफ़िलों के आदतन तुम आन थे तुम शान थे
    तुम्हारे महफ़िलों में सिर्फ़ मेरी ही कमी अच्छी लगी

    लहू के घुट पी करते गए हम यूँ तो हाल-ए-दिल बयाँ
    ख़ुशी की बात हैं तुम को हमारी शा'इरी अच्छी लगी
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    था बसाया दिल में हर लम्हात को
    कोसता मैं रह गया हालात को

    एक सी है रत-जगों की ज़िंदगी
    चाँद मुझ से कह रहा था रात को

    मैं तो समझा हूँ तुम्हारी बात सब
    तुम भी तो समझो ना मेरी बात को

    हूँ बराबर इश्क़ के इस खेल में
    मानता हूँ जीत अपनी मात को

    तोड़ना ही है सभी का दिल तुझे
    मैं न समझा तेरे इस जज़्बात को
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    रातों को उठ-उठ के रोना बंद करो
    आशिक़ हो, दीवाने होना बंद करो

    सच कहता हूँ रातें अच्छी गुज़रेंगी
    तुम भी उस को सोच के सोना बंद करो

    टूटे घर में कोई न आना चाहेगा
    इस दिल का अब कोना-कोना बंद करो

    बीत चुकी जो उस को सोचे जाते हो
    आज के इस लम्हे को खोना बंद करो

    हाल-ए-दिल लोगों को अपना बतलाके
    सबके दिल में काँटे बोना बंद करो

    'अर्ज़' तुम्हें जिन लोगों ने ठुकराया है
    तुम भी उन लोगों का होना बंद करो
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    नींद, करवट, अश्क, शिकवे और कुछ जज़्बात हैं
    कितने नाज़ुक आज की इस रात के हालात हैं

    सामने मेरे ही उस का हाथ था
    में था रक़ीब
    मैं उसी दिन मान बैठा इश्क़ में ये मात हैं

    अजनबी इक शख़्स के लग कर गले हम रो पड़े
    पूछता वो रह गया "कुछ तो बता, क्या बात हैं"?

    पहले लगता था हसीं मौसम हुआ है इश्क़ में
    अब ये लगता है कि जैसे हर घड़ी बरसात हैं

    बैंड-बाजा और ऊपर से पटाखों का ये शोर
    चीर डाले दिल को जो तलवार सी बारात हैं

    कोई आए, कोई जाए, फ़र्क अब पड़ता नहीं
    दिल लगाने के नहीं अब 'अर्ज़' के हालात हैं
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    Ankit Dixit
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