आज भी वो वो ही है और अदा भी वो ही है
बे-वफ़ा भी वो ही है और ख़फ़ा भी वो ही है
बे-वफ़ा भी वो ही है और ख़फ़ा भी वो ही है
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मेरी दीवानगी से वो ख़फ़ा था
सफ़र में साथ छोड़ेगा पता था
सफ़र में साथ छोड़ेगा पता था
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फिर पुराने हिसाब कर लेंगे
लग गले चाँद-रात आई है
लग गले चाँद-रात आई है
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मोहब्बत में रक़ीबों पे नजर जाती है समझो
अजब है पर इधर की बेल उधर जाती है समझो
अजब है पर इधर की बेल उधर जाती है समझो
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भोर होने को है हर रात को यूँ समझा है
मुश्किलों से भरे हालात को यूँ समझा है
मुश्किलों से भरे हालात को यूँ समझा है
शांत इस तरह ही होती है पहाड़ी नद्दी
हर उबलते हुए जज़्बात को यूँ समझा है
मेरा किरदार कहानी में अभी है ज़िंदा
बा'द मुद्दत की मुलाक़ात को यूँ समझा है
इम्तिहानों के लिए ज्ञान मिला है आतिश
ज़िन्दगी में मिली हर मात को यूँ समझा है
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शाम को रोज़ बुलंदी से उतर आते हैं
जो परिंदे हैं वो तो लौट के घर आते हैं
जो परिंदे हैं वो तो लौट के घर आते हैं
उम्र भर साथ निभाने को कोई कहता है
तब मुहब्बत में अगर और मगर आते हैं
उन को व्यापार ही व्यापार नज़र आता है
लोग जो जिस्म की गलियों से गुज़र आते हैं
बे-वफ़ाओं की बताता हूँ अनूठी पहचान
वे ज़ियादा ही वफ़ादार नज़र आते हैं
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यार तुम बद-नसीब कैसे हो
बाप है फिर गरीब कैसे हो
बाप है फिर गरीब कैसे हो
आप अटके शिया और सुन्नी में
फिर ख़ुदा के क़रीब कैसे हो
ख़ुद की थाली में छेद कर डाला
यार इतने अजीब कैसे हो
बूढ़े बरगद की छाँव में हो तुम
बेटे फिर ग़म-नसीब कैसे हो
तुम से पूरी हुई कहानी ये
दोस्त हो तुम रक़ीब कैसे हो
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