मुहब्बत मुझ सेे है तो एक वा'दा कर
मुझे चाहो न चाहो ख़ुद को चाहा कर
तेरी ख़ूबी में अक्सर भूल जाता हूँ
कभी हीरा कभी पत्थर पुकारा कर
दुआएँ भी नहीं और राह पथरीली
सफ़र कर पर हवा का रुख भी देखा कर
अगर भरना है तो भर लो उड़ान ऊँची
मगर कंधों से पहले बोझ हल्का कर
— Aatish Indori















