शाम को रोज़ बुलंदी से उतर आते हैं
जो परिंदे हैं वो तो लौट के घर आते हैं
उम्र भर साथ निभाने को कोई कहता है
तब मुहब्बत में अगर और मगर आते हैं
उन को व्यापार ही व्यापार नज़र आता है
लोग जो जिस्म की गलियों से गुज़र आते हैं
बे-वफ़ाओं की बताता हूँ अनूठी पहचान
वे ज़ियादा ही वफ़ादार नज़र आते हैं
— Aatish Indori















