अगर मैं कह दूँ मेरे हाल-ए-दिल का हाल सब है ठीक
यही तो वक़्त है जाँ सीने से मुझ को लगाने का
यही तो वक़्त है जाँ सीने से मुझ को लगाने का
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मुझे अच्छा नहीं लगता कोई हमदर्द भी मेरा
वफ़ा की बात है तो फिर करे कोई वफ़ा हम से
वफ़ा की बात है तो फिर करे कोई वफ़ा हम से
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तुम्हें ज़रूर हिफ़ाज़त से कोई रक्खेगा
मगर दवा कहाँ से हिज्र की वो लाएगा
मगर दवा कहाँ से हिज्र की वो लाएगा
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ये हुनर भी लिखने का मुझ में तो नहीं था पर
इश्क़ जो भी करते हैं शा'इरी ही करते हैं
इश्क़ जो भी करते हैं शा'इरी ही करते हैं
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मिरा अब नहीं लगता दिल तो कहीं भी
हक़ीक़त ये मैं हूँ भी और अब नहीं भी
हक़ीक़त ये मैं हूँ भी और अब नहीं भी
जी ऐसे रहा हूँ कि मेरा कोई नइँ
मैं घर पहले रहता था और अब कहीं भी
मिरे साथ ख़्वाबों की दुनिया है लेकिन
हक़ीक़त में इक ख़्वाब-दीदा नहीं भी
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जितनी भी ख़्वाहिशें थी सभी मेरी थीं
जितने भी ख़्वाब थे सब के सब तेरे थे
जितने भी ख़्वाब थे सब के सब तेरे थे
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ज़िन्दगी में रहे संग तीनों ही हम
मैं मिरी ये क़लम और मेरा ये ग़म
मैं मिरी ये क़लम और मेरा ये ग़म
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ख़ुशी और ग़म का तो आलम यही है
कि सिगरेट जलती है दोनों समाँ पर
कि सिगरेट जलती है दोनों समाँ पर
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