Naresh sogarwal 'premi'

Naresh sogarwal 'premi'

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Naresh sogarwal 'premi' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Naresh sogarwal 'premi''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

नहीं रहता मुसलसल शादमानी से कोई चेहरा कोई तो देख ले हम को भी संजीदा निगाहों से — Naresh sogarwal 'premi'
तुझ को मालूम नहीं ग़ौर से पढ़ना आलिम कितना रोया हूँ मैं किस शे'र को लिखते अवसर — Naresh sogarwal 'premi'
वही जनवरी वही फरवरी वही सोमवार वही शुक्रवार नया साल आ गया ले के फिर वही ज़ाबता वही दास्तान — Naresh sogarwal 'premi'
आप के चाहने वाले तो बिछड़ जाते हैं जल्द प्रेमी क्या लज़्ज़त-ए-इश्क़-ए-बुताँ करिएगा आप — Naresh sogarwal 'premi'
अगर मैं कह दूँ मेरे हाल-ए-दिल का हाल सब है ठीक यही तो वक़्त है जाँ सीने से मुझ को लगाने का — Naresh sogarwal 'premi'
जुदा भी तुम मुझ सेे हो गई वो भी ख़ुदस अब दूर हो गया है वो जाने कब का भी मर चुका कौन है जो मशहूर हो गया है — Naresh sogarwal 'premi'
कटती नहीं है बे-कली मेरी शफ़ीक़ जब तक कि ख़ुद पर तंज़ कस लेता नहीं — Naresh sogarwal 'premi'
याद आई ख़ूब रोने दिया हम ने ख़ुद को पर ग़म में कभी रक़ीब की इस्तिदआ की नहीं — Naresh sogarwal 'premi'
ऐ सनम हमारे तो बड़े नसीब हैं ख़राब इत्तिफ़ाक़ में ये लड़का ग़मज़दा मिला तुम्हें — Naresh sogarwal 'premi'
निशात-ओ-ऐश-ए-अलम की न ही दवा लीजे अगर कमाना है इल्म इस की फिर सज़ा लीजे — Naresh sogarwal 'premi'
ये दूरियाँ तो रास्तों की हैं मता-ए-जाँ कि नक़्शे में तो तुम बहुत क़रीब लगती हो — Naresh sogarwal 'premi'
तुम आना जब मिरे दिन अच्छे हों मता-ए-जाँ बुरा है वक़्त अभी और अच्छे दिन नहीं मालूम — Naresh sogarwal 'premi'
इसी से सुकूँ और इसी से हूँ बेताब मैं रो लेता हूँ याद में तेरी अक्सर — Naresh sogarwal 'premi'
तुम किसी तरह मिरे क़रीब आ नहीं सकी तुम को आने से मिरा ख़याल रोक नइँ सका — Naresh sogarwal 'premi'
नहीं है ज़ख़्मों को बर्दाश्त मुझ को चैन कहाँ कि मेरे घाव महकते हैं फूलों की जैसे — Naresh sogarwal 'premi'
गो उस ने ऐसी भी आदत छुड़ाई फ़क़त जिस की ज़बाँ पर आश्ना थी — Naresh sogarwal 'premi'
हयात से मुझे करिश्में की उमीद थी मैं ख़ुद ही इक अजूबा था करिश्मा होता क्या — Naresh sogarwal 'premi'
शख़्स जो रहता है हर पल मिरी रूह-ओ-जाँ में बद-नसीबी कि उसे मैं ने छुआ तक भी नहीं — Naresh sogarwal 'premi'
यही था हक़ तिरा क्या वो यही मुहब्बत थी मना किया था तुझे और तू ये मान गई — Naresh sogarwal 'premi'
मेरी मजबूरी पे तोहमत ही लगाने आओ जान फिर से किसी दिन मुझ को रुलाने आओ — Naresh sogarwal 'premi'

Ghazal

इस उम्र के ये ज़ुल्म-ओ-सितम हम सेे पूछिए रूठा हुआ है अब्र-ए-करम हम सेे पूछिए बचपन में ही बिछड़ गया हम सेे ये बचपना वालिद के खोने का ये अलम हम सेे पूछिए जो आप रोए आप की ज़िद पूरी हो गई गोया खिलौने का ये अलम हम सेे पूछिए रो देते भी हैं देख के फ़िल्मों की ट्रेजडी कितना हमारा दिल है सुगम हम सेे पूछिए पड़ जाती है नज़र किसी जफ़्ती पे किस ख़याल बढ़ जाते हैं हमारे क़दम हम सेे पूछिए जो पास भी नहीं है मगर लगता है कि है रिश्ता-ए-जाँ का रखना भरम हम सेे पूछिए ख़्वाबों के ज़ख़्म हो गए नासूर टुकड़ों में कैसे निकल रहा है ये दम हम सेे पूछिए बिल्कुल नहीं इरादा जिसे भूलने का भी करती हैं यादें कैसे सितम हम सेे पूछिए 'प्रेमी' जो देख लें अभी तो कह के या-ख़ुदा बढ़ जाएँगे सो उन के क़दम हम सेे पूछिए — Naresh sogarwal 'premi'