एक सूरत भोली भाली हाए हाए
वो हँसी जाँ लेने वाली हाए हाए
छिन गई मुस्कान मेरे चेहरे की
बुझ गई होंठों की लाली हाए हाए
कह रहे हैं जिस्म का क्या कर लिया
क्या हुई तेरी जमाली हाए हाए
पड़ गए बीमार तेरी याद में
गुज़री थी ऐसी दिवाली हाए हाए
मिल गई या-रब जुदाई एक और
कैसी क़िस्मत लिख ये डाली हाए हाए
— Naresh sogarwal 'premi'















